बालाघाट

वर्तमान भारत में देश तो अपना, पर लोग पराए हो रहे हैं

वर्तमान भारत में देश तो अपना, पर लोग पराए हो रहे हैं पत्रिका से चर्चा में वरिष्ठजनों ने व्यक्त किए अपने विचार आजादी के बाद और वर्तमान भारत पर दी प्रतिक्रियाएं प्रथम गणतंत्र दिवस मनाने के सांझा किए किस्से

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Jan 26, 2025
वर्तमान भारत में देश तो अपना, पर लोग पराए हो रहे हैं

इंट्रो:- वर्तमान भारत में देश तो अपना हैं, लेकिन लोग पराए से होने लगे हैं। वसुधैव कुटुम्बकम की भावना लगभग समाप्त सी होने लगी है। आजादी के बाद से देश में ऐसे काफी बदलाव देखने को मिलते हैं। उस दौर की बात कुछ और ही है। कुछ इसी तरह के विचार शहर के सीनियर सिटीजनों ने पत्रिका से चर्चा में व्यक्त की। इन्होंने अपने जीवन काल के पहले गणतंत्र दिवस और राष्ट्रीय पर्व के रोचक किस्से भी सांझा किए।

गांधी मंच में फहराए थे तिरंगा
पहले राष्ट्रीय पर्व का मुख्य समारोह हम गुजरी बाजार के गांधी मंच में मनाया करते थे। भारत का पहला गणतंत्र दिवस भी हमने वहीं झंडा वंदन कार्यक्रम में शामिल होकर मनाया था। १९५७ से ९६ तक मै पुलिस विभाग में रहा। तब पुलिस की ओर से मै हर राष्ट्रीय पर्व की परेड पर बिगुलर बजाया करता था। आवाज सुनकर की देश भक्ति और जनसेवा का जज्बा जागृत होता था। उस समय तिरंगा फहराने के अलावा राष्ट्रगान और परेड हुआ करती थी। साहित्यिक और सम्मान समारोह जैसी गतिविधियां नहीं होती थी। फिर भी हम पूरे कार्यक्रम तक समारोह में शामिल हुआ करते थे।
ठुन्नालाल पटले (८७ वर्ष), सेनि पुलिस कर्मचारी

यूनिफार्म को अरारोट से करते थे क्लब
मेरा शुरूआत से ही विभिन्न खेलों से लगाव रहा है। १९७२ में वन विभाग में भी कुछ वर्ष सेवाएं की। एक खिलाड़ी के रूप में राष्ट्रीय पर्व के कार्यक्रमों में शामिल होना एक अलग की गर्व की अनुभूति कराता है। मुझे आज भी याद है राष्ट्रीय पर्व आने के पूर्व ही हम तैयारी में जुट जाया करते थे। खासकर कार्यक्रम में शामिल होने अपनी यूनिफार्म या कपड़ों को चमकाने अरारोट से क्लब किया करते थे। पैरा में जूते-चप्पल हो या न हो, लेकिन कपड़े साफ सुथरे और स्त्री करने जैसे दिखाई देने चाहिए थे। कपड़ों को स्त्री करने ही अरारोट से घिसाई करते थे, कपड़े की धार इतनी तेज हो जाया करती थी कि नीबू कट जाए।
नंदकिशोर पिपलेवार (७६), वरिष्ठ खिलाड़ी

सप्ताह भर पहले से करते थे तैयारी
एक शिक्षक होने के नाते राष्ट्रीय पर्व के गणतंत्र दिवस और १५ अगस्त के कार्यक्रम काफी महत्वपूर्ण हुआ करते है। मै शहर के प्रमुख गर्वमेंट स्कूल में संस्कृत शिक्षक और स्कूल का स्काउट टीचर भी था। उस समय में शहर में दो ही प्रमुख स्कूल हुआ करते थे। स्कूल में ध्वजारोहण कार्यक्रम की तैयारी और स्काउट के बच्चे अच्छा प्रदर्शन करें इसलिए सप्ताह भर पूर्व से ही अभ्यास शुरू करवा दिया करता था। बच्चों के अच्छे प्रदर्शन से सीना गर्व से प्रफुल्लित हो जाया करता था। अब सेनि हो गया हॅू। लेकिन कभी कभार आस पास के झंडा वंदन कार्यक्रम में शामिल होने जाया करता हॅू। लेकिन देशक्ति का वह जज्बा और राष्ट्रीय पर्व का उल्लास नजर नहीं आता है।
एसपी ज्योतिषि (८०), सेनि शिक्षक

संविधान निर्माण में मप्र की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। हमारे साथ ही कुछ लोग भी टीम में शामिल रहे हैं। संविधान भारत को एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रित गणराज्य घोषित करता है। लेकिन इसके अनुरूप कार्य होता नजर नहीं आता है। अब लोग कुछ अधिक ही समझदार हो गए हैं। व्यक्तिगत और पारिवारिक हित साधने में लगे हुए। वसुधैव कुटुम्बकम की भावना लगभग समाप्त सी होने लगी है। आजादी के बाद से देश में ऐसे काफी बदलाव देखने को मिलते हैं। हालाकि राष्ट्रीय पर्व पहले भी इसी तरह मनाए जाते थे। लेकिन आडंबर और औपचारिकताओं का दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं हुआ करता था, अब राष्ट्रीय पर्व के मायने बदलते नजर आते हैं। राष्ट्रीय पर्व एक दिन का अवकाश और परिवार के साथ मौज मस्ती करने वाला दिन बनता जा रहा है।
प्रेमप्रकाश त्रिपाठी (७६), सेनि शिक्षक

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