-नपा और जल संसाधन विभाग के बीच फंसी जिम्मेदारी, 4 करोड़ की स्वीकृत राशि के बावजूद पेयजल संकट के आसार। बैतूल। खेड़ी स्थित ताप्ती नदी पर बने बैराज की क्षतिग्रस्त कि-वॉल की मरम्मत को लेकर नगरपालिका और जल संसाधन विभाग (डब्ल्यूआरडी) के बीच जिम्मेदारी का पेंच लगातार गहराता जा रहा है। हालात यह हैं कि […]
-नपा और जल संसाधन विभाग के बीच फंसी जिम्मेदारी, 4 करोड़ की स्वीकृत राशि के बावजूद पेयजल संकट के आसार।
बैतूल। खेड़ी स्थित ताप्ती नदी पर बने बैराज की क्षतिग्रस्त कि-वॉल की मरम्मत को लेकर नगरपालिका और जल संसाधन विभाग (डब्ल्यूआरडी) के बीच जिम्मेदारी का पेंच लगातार गहराता जा रहा है। हालात यह हैं कि स्टेट लेवल टेक्निशियन कमेटी (एसएलटीसी) द्वारा करीब एक साल पहले ही बैराज की मरम्मत की जिम्मेदारी डब्ल्यूआरडी को सौंप दी गई थी और अमृत योजना के तहत लगभग 4 करोड़ रुपए की राशि भी स्वीकृत हो चुकी है, इसके बावजूद आज तक जमीनी स्तर पर मरम्मत कार्य शुरू नहीं हो पाया है। यह स्थिति प्रशासनिक उदासीनता और आपसी समन्वय की कमी को उजागर करती है। बैराज की क्षतिग्रस्त कि-वॉल से लगातार पानी का रिसाव हो रहा है, जिससे जलसंग्रहण क्षमता प्रभावित हो रही है। इसका सीधा असर आने वाले गर्मी के मौसम में पडऩे की आशंका है, जब शहर को पेयजल संकट का सामना करना पड़ सकता है। विडंबना यह है कि जिस बैराज का निर्माण शहर की जलापूर्ति को सुरक्षित और स्थायी बनाने के लिए किया गया था, वहीं बैराज आज खुद प्रशासन की लापरवाही का शिकार बन चुका है।
6.92 करोड़ की लागत, लेकिन टिकाऊ निर्माण पर सवाल
वर्ष 2018 में अमृत योजना के अंतर्गत खेड़ी स्थित ताप्ती नदी पर इस बैराज का निर्माण नगरपालिका द्वारा 6 करोड़ 92 लाख रुपए की लागत से कराया गया था। निर्माण कार्य रायपुर की चंद्रा निर्माण कंस्ट्रक्शन कंपनी ने किया था, लेकिन निर्माण के महज पहले ही साल में ताप्ती नदी में आई बाढ़ ने बैराज की कि-वॉल का एक हिस्सा बहा दिया। इसके बाद भी निर्माण की गुणवत्ता और डिजाइन पर गंभीरता से पुनर्विचार नहीं किया गया।
नगरपालिका ने क्षति के बाद ठेकेदार की अमानत राशि रोककर अस्थायी मरम्मत कराई, जिस पर करीब 10 लाख रुपए खर्च हुए, लेकिन यह मरम्मत अगली बाढ़ में ही बह गई, जिससे किसानों के खेतों में मिट्टी का कटाव और बढ़ गया। इसके बाद लोहे की जालियां, पत्थर और मिट्टी डालकर एक और अस्थायी संरचना खड़ी की गई, जिस पर करीब 5 लाख रुपए खर्च किए गए। यह प्रयास भी ताप्ती नदी के तेज बहाव के सामने टिक नहीं सका। सवाल यह उठता है कि जब पहली बार ही अस्थायी मरम्मत विफल हो चुकी थी, तो बार-बार उसी तरह के उपाय क्यों किए गए?
डिजाइन विवाद और सर्वे में देरी
करीब एक साल से बैराज की मरम्मत का मामला डब्ल्यूआरडी के पास लंबित है, लेकिन विभाग अब तक न तो क्षतिग्रस्त हिस्से का विस्तृत सर्वे कर सका है और न ही स्वाइल टेस्टिंग शुरू हो पाई है। डब्ल्यूआरडी अधिकारियों का कहना है कि नगरपालिका ने बैराज की ड्राइंग और डिजाइन उन्हें उपलब्ध नहीं कराई है। वहीं विभाग यह भी स्वीकार करता है कि जिस स्थान पर कि-वॉल क्षतिग्रस्त हुई है, वहां फाउंडेशन बेहद कमजोर है और करीब दस फीट तक मिट्टी व रेत की परत है, ठोस चट्टान नहीं है। डब्ल्यूआरडी के अनुसार यदि जल्दबाजी में मरम्मत की गई तो भविष्य में फिर नुकसान हो सकता है। विभाग का यह भी कहना है कि बैराज की मूल डिजाइन और स्थल चयन ही गलत था। ऐसे में स्वाइल टेस्टिंग के बाद कि-वॉल की डिजाइन और लंबाई में बदलाव जरूरी होगा, ताकि इसे नदी के अंतिम फ्लर्ट एरिया तक बढ़ाया जा सके।
पेयजल व्यवस्था पर सीधा असर
ताप्ती बैराज में कुल 18 गेट लगे हैं और इसकी कुल ऊंचाई 7 मीटर है। वर्तमान में बारिश के बाद सभी गेट बंद कर दिए जाते हैं, लेकिन क्षतिग्रस्त हिस्से से अतिरिक्त पानी बहकर निकल जाता है। नतीजतन गर्मियों में नगरपालिका को पारसडोह जलाशय से अतिरिक्त पानी खरीदना पड़ता है, जिससे आर्थिक बोझ भी बढ़ता है। स्थिति यह है कि यदि जल्द निर्णय और ठोस कार्रवाई नहीं हुई तो आने वाले वर्ष में भी बैराज की मरम्मत अधर में ही लटकी रहेगी। यह मामला केवल एक संरचना की मरम्मत का नहीं, बल्कि शहर की जल सुरक्षा और प्रशासनिक जवाबदेही का है, जिस पर अब भी गंभीरता से ध्यान नहीं दिया जा रहा।
इनका कहना
-ताप्ती बैराज के कि-वॉल के हिस्से की मरम्मत आने वाले साल में बारिश से पहले कर दी जाएगी। चूंकि फाउंडेशन के लिए पहले स्वाइल टेस्टिंग करना होगा। इसके बाद भी कि-वॉल को किस तरह बनाया जाना हैं यह तक हो सकेगा। हम जल्दबाजी नहीं करना चाह रहे हैं। भले काम देरी से हो, लेकिन मजबूती के साथ बैराज खड़ा रहे।