हकीकत: 5 साल में धरातल पर नहीं उतरी नीति, बीएसआर में नाम नहीं और वर्क ऑर्डर से एम-सैंड नदारद आंकड़ों की बाजीगरी में उलझा बजरी का विकल्प बजरी माफिया पर नकेल कसने और सस्ता विकल्प देने के लिए राज्य सरकार ने बजट में सरकारी कार्यों में 50 प्रतिशत एम-सैंड (मैनीफैक्चर्डसैंड) के उपयोग की घोषणा तो […]
बजरी माफिया पर नकेल कसने और सस्ता विकल्प देने के लिए राज्य सरकार ने बजट में सरकारी कार्यों में 50 प्रतिशत एम-सैंड (मैनीफैक्चर्डसैंड) के उपयोग की घोषणा तो कर दी है, लेकिन सरकारी मशीनरी की सुस्ती ने इस महत्वकांक्षी योजना को महज कागजों तक सीमित कर दिया है।
हकीकत यह है कि बीते 5 वर्षों में एम-सैंड को बढ़ावा देने के लिए धरातल पर कोई ठोस काम नहीं हुआ। विडंबना देखिए, जिस एम-सैंड को अनिवार्य करने की बात हो रही है, उसे अब तक सरकारी विभागों की बीएसआर (बेसिक शेड्यूल ऑफ रेट्स) तक में नहीं जोड़ा गया है। ना ही पीडब्ल्यूडी या अन्य निर्माण एजेंसियों के वर्क ऑर्डर में एम-सैंड का जिक्र होता है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब सिस्टम में प्रावधान ही नहीं है, तो ठेकेदार 50 फीसदी उपयोग करेंगे कैसे?
एम-सैंड नीति की सफलता के झूठे आंकड़े पेश करने के लिए विभाग ने बड़ा खेल कर रखा है। खनिज विभाग ने आंकड़े जारी करने की होड़ में उन क्रशर मालिकों को भी एम-सैंड की टीपी (रवन्ना) काटने की परमिशन दे दी है, जिन्होंने एम-सैंड का प्लांट तक नहीं लगा रखा है।
डस्ट को बताया जा रहा सैंड: कागजों में तो एम-सैंड का भारी उत्पादन और परिवहन दिख रहा है, लेकिन हकीकत में या तो क्रशर की 'डस्ट' खपाई जा रही है या फिर सिर्फ फर्जी टीपी कट रही है। खान विभाग ने आज तक यह असेसमेंट नहीं किया कि किस ठेकेदार ने वास्तव में एम-सैंड का उपयोग किया और किसने नहीं।
एम-सैंड उत्पादक का कहना है कि पिछले पांच साल से गुहार लगा रहे हैं कि इसे बीएसआर में शामिल करें और वर्क ऑर्डर में स्पष्टता लाएं, लेकिन उनकी मांगों को रद्दी की टोकरी में डाल दिया गया। नीति बनाने वाले खान विभाग की उदासीनता के चलते न तो बजरी का संकट खत्म हो रहा है और न ही वैध कारोबार पनप पा रहा है।
भीलवाड़ा जिले के कारोई में एमसैंड के दो प्लांट लगे है। इनमें प्रतिदिन 500 टन एमसैंड का उत्पादन होता है। मजेदार बात यह है कि यह सारा एमसैंड केवल हिन्दुस्तान जिंक काम में ले रहा है। इसके अलावा कोई भी ठेकेदार इसको काम में नहीं लेता है। ठेकेदारों का कहना है कि एमसैंड बजरी से महंगा मिलता है। जबकि खनिज व्यापारी का कहना है कि एम सैंड बजरी से सस्ती है।
भीलवाड़ा में खनन का विशाल क्षेत्र है। यहां वेस्ट डंप (मलबा) के पहाड़खड़े हैं। खनिज उद्यमी अनिल सोनी का कहना है कि सरकार अगर एम-सैंड की उपयोगिता पर गंभीरता से काम करे और नियमों को व्यावहारिक बनाए, तो अकेले भीलवाड़ा जिले में कई दर्जन से अधिक प्लांट लगने की संभावना है। इससे न केवल खनन क्षेत्र के पास पड़े मलबे के ढेर समाप्त होंगे, बल्कि पर्यावरण भी सुधरेगा। आमजन को बजरी का मजबूत व सस्ता विकल्प मिलेगा और हजारों लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।