भीलवाड़ा

राज्य मंच…बंजर धरती में जान फूंक रही पुनर्योजी कृषि, भीलवाड़ा का रीजेनाग्री धागा विदेशों में मचा रहा धूम

Jul 18, 2026
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B- बीमार मिट्टी के लिए अमृत बनी नई तकनीक, पारंपरिक और जैविक खेती से अलगB
Bसुरेश जैन
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Bभीलवाड़ा.B आधुनिक खेती के दौर में अंधाधुंध रासायनिक खादों के उपयोग और गहरी जुताई ने भले ही राजस्थान की उपजाऊ भूमि को बंजर और बेजान बना दिया हो, लेकिन इस संकट के बीच किसानों के लिए पुनर्योजी कृषि एक नए अमृत के रूप में उभर कर सामने आई है। यह पारंपरिक या जैविक खेती नहीं है। यह बीमार हो चुकी मिट्टी को दोबारा जीवित करने और पर्यावरण को सुधारने का एक उन्नत वैज्ञानिक तरीका है। इस नई पद्धति को अपनाकर भीलवाड़ा और प्रदेश के किसान कपास की खेती कर रहे हैं। यह कपास न केवल किसानों के लिए मुनाफे का सौदा बन रही है, बल्कि स्पिनिंग मिलों (टेक्सटाइल) को भी उच्च गुणवत्ता वाली उपज मिल रही है।
Bविदेशी बाजारों में रीजेनाग्री का दबदबाB
पुनर्योजी पद्धति से तैयार इस कपास से बनने वाले विशेष धागे को रीजेनाग्री सूती धागा नाम दिया है। टेक्सटाइल नगरी से निर्यात होने वाले इस इको-फ्रेंडली धागे की मांग बांग्लादेश, टर्की और अमरीका जैसे देशों में तेजी से बढ़ रही है। कपड़ा उद्यमियों का मानना है कि आने वाले समय में यह धागा टेक्सटाइल इंडस्ट्री में टिकाऊपन और पर्यावरण संरक्षण की एक नई क्रांति लिखेगा।
Bधरती का सीना छलनी होने से बचाएंगी ये चार पद्धतियांB
प्रदेश में पानी की कमी और मिट्टी का कटाव बड़ी चुनौती है। इसे मात देने के लिए इस नई तकनीक के चार मुख्य स्तंभ हमारी खेती की तस्वीर बदल रहे हैं। बार-बार गहरी जुताई करने से मिट्टी के भीतर मौजूद जीवाणु नष्ट हो जाते हैं और जमीन की नमी हवा में उड़ जाती है। कम जुताई से मिट्टी का प्राकृतिक ढांचा और नमी दोनों सुरक्षित रहते हैं। मुख्य फसल की कटाई के बाद जमीन को खाली या नग्न छोड़ने से धूप के कारण पोषक तत्व नष्ट होते हैं। खाली समय में आवरण फसलें उगाकर जमीन को ढक कर रखा जाता है, जिससे मिट्टी का कटाव रुकता है। जमीन के भीतर हर समय पौधों की सक्रिय जड़ें होने से मिट्टी की पानी सोखने की क्षमता बढ़ती है। इससे गिरते जलस्तर में भी सुधार होता है। नग्न जमीन कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन करती है, जबकि यह पद्धति इसे रोकती है।
Bजलवायु परिवर्तन के खिलाफ अचूक हथियारB
पुनर्योजी कृषि केवल खेत तक सीमित नहीं, यह ग्लोबल वार्मिंग का भी समाधान है। एक शोध के अनुसार यदि दुनिया की कृषि भूमि को इस प्रणाली में बदल दिया जाए, तो यह सालाना 23 गीगाटन से अधिक कार्बन डाइऑक्साइड को सोख सकती है जो वर्तमान वैश्विक उत्सर्जन से भी अधिक है। पारंपरिक खेती जहां ग्रीन हाउस गैसें उत्सर्जित करती है, वहीं यह तकनीक वातावरण से कार्बन को खींचकर वापस मिट्टी में जमा कर देती है।
Bकपास की अच्छी कीमत B
पुनर्योजी कृषि पद्धति से कपास का उत्पादन किसानों के लिए बेहद लाभकारी साबित हो रहा है। इससे मिट्टी का स्वास्थ्य सुधर रहा है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रीजेनाग्री प्रमाणीकरण के चलते उपज की अच्छी कीमत भी मिल रही है।
B- वीके जैन,B उप निदेशक, कृषि विभाग, भीलवाड़ा

Updated on:
18 Jul 2026 06:00 am
Published on:
18 Jul 2026 06:00 am