अवैध बजरी परिवहन और अवैध खनन पर लगाम के सरकारी दावे जमीनी हकीकत के आगे दम तोड़ रहे हैं। सरकार की इच्छाशक्ति पर सवालिया निशान तब खड़ा हो जाता है, जब प्रदेश को राजस्व देने में तीसरे नंबर पर रहने वाला खान विभाग खुद संसाधनों, सुरक्षा और पर्याप्त अधिकारियों के टोटे से जूझ रहा है। […]
अवैध बजरी परिवहन और अवैध खनन पर लगाम के सरकारी दावे जमीनी हकीकत के आगे दम तोड़ रहे हैं। सरकार की इच्छाशक्ति पर सवालिया निशान तब खड़ा हो जाता है, जब प्रदेश को राजस्व देने में तीसरे नंबर पर रहने वाला खान विभाग खुद संसाधनों, सुरक्षा और पर्याप्त अधिकारियों के टोटे से जूझ रहा है।
हैरानी की बात यह है कि खनन माफिया अत्याधुनिक साधन व संसाधनों से लैस हैं, जबकि उन्हें पकड़ने के लिए जिम्मेदार अधिकारी खटारा गाड़ियों और बिना सुरक्षा बल व उपकरणों के जान जोखिम में डाल रहे हैं। कुछ दिनों पूर्व ब्यावर में विभागीय अधिकारियों के साथ हुई मारपीट और वाहनों में तोड़फोड़ की वारदात ने यह साबित कर दिया है कि विभाग के तकनीकी अधिकारी असुरक्षित हैं।
विभाग की लाचारी का जीता-जागता उदाहरण बिजौलियां खान विभाग का कार्यालय है। यहां वर्षों पुराना एक खटारा वाहन है, जो तीन लाख किलोमीटर से ज्यादा चल चुका है। जब भी अधिकारी अवैध बजरी परिवहन करने वाले वाहनों का पीछा करते हैं, यह गाड़ी रास्ते में ही दम तोड़ देती है। ऐसे में माफिया आंखों के सामने से ओझल हो जाता है।
प्रदेश के अधिकांश खनि अभियंता कार्यालयों में औसतन मात्र दो तकनीकी अधिकारियों की नियुक्ति है। इन पर काम का इतना बोझ है कि कार्रवाई करना तो दूर, रूटीन काम निपटाना भी मुश्किल है।
दो अधिकारियों को कार्यालय का कामकाज, फील्ड में आवेदनों का सीमांकन, नए खनिज क्षेत्रों का चयन, शिकायतों का निराकरण, ऑनलाइन वर्क, पुरानी वसूली और अवैध खनन की जांच करनी होती है। अगर कोई अवैध वाहन पकड़ भी लिया, तो उसे जब्त कर थाने में एफआईआर दर्ज करवाने की प्रक्रिया में ही पूरा एक दिन निकल जाता है।
अवैध खनन पर नकेल कसने के लिए बनाई गई विजिलेंस टीम खुद नेतृत्व विहीन है। प्रदेश भर में विजिलेंस के कई अहम पद खाली पड़े हैं। भीलवाड़ा जैसे महत्वपूर्ण खनन क्षेत्र में एसएमई विजिलेंस का पद लम्बे समय से रिक्त है। जब मॉनिटरिंग करने वाला मुखिया ही नहीं है, तो कार्रवाई की उम्मीद कैसे की जा सकती है। अभी एसएमई कार्यालय में एक एमई व एक बाबू के भरोसे पूरा जिला चल रहा है।