मध्य-पूर्व क्षेत्र में चल रहे युद्ध और बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने वैश्विक व्यापार की कमर तोड़ दी है। गल्फ क्षेत्र के समुद्री मार्गों पर छाई अनिश्चितता और कंटेनर शिपिंग सेवाओं के बाधित होने का सीधा और गंभीर असर भीलवाड़ा टेक्सटाइल क्षेत्रों, विशेषकर यहां की लाइफलाइन माने जाने वाले टेक्सटाइल उद्योग पर पड़ रहा है। हालात […]
मध्य-पूर्व क्षेत्र में चल रहे युद्ध और बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने वैश्विक व्यापार की कमर तोड़ दी है। गल्फ क्षेत्र के समुद्री मार्गों पर छाई अनिश्चितता और कंटेनर शिपिंग सेवाओं के बाधित होने का सीधा और गंभीर असर भीलवाड़ा टेक्सटाइल क्षेत्रों, विशेषकर यहां की लाइफलाइन माने जाने वाले टेक्सटाइल उद्योग पर पड़ रहा है। हालात यह हैं कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार लगभग ठहराव की स्थिति में पहुंच गया है और स्थानीय उद्योगों के लिए यह अब तक के सबसे कठिन दौर में से एक बन गया है।
टेक्सटाइल प्रोसेसिंग में सबसे ज्यादा उपयोग होने वाले महत्वपूर्ण कच्चे माल, जैसे डाइज़, केमिकल्स और अन्य औद्योगिक रॉ मटेरियल जो मुख्य रूप से चीन से आयात होते हैं, की आपूर्ति में भारी बाधा उत्पन्न हो गई है। नया माल समय पर नहीं पहुंचने से बाजार में कच्चे माल का टोटा पड़ गया है। जो सीमित स्टॉक बाजार में उपलब्ध है, उसके व्यापारियों ने अवसर का फायदा उठाते हुए कालाबाजारी शुरू कर दी है। इसके चलते दामों में 30 से 40 प्रतिशत तक की वृद्धि हो गई है।
एलपीजी गैस की कमी को देखते हुए सरकार ने फिलहाल सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को घरेलू उपयोग के लिए गैस आपूर्ति प्राथमिकता से करने के निर्देश दिए हैं। इससे प्रोसेस हाउस और औद्योगिक इकाइयों के संचालन में भारी कठिनाई आ रही है।पेट्रोलियम आधारित उत्पादों की कीमतों में आग लगी है। टेक्सटाइल प्रोसेसिंग, धागा निर्माण और वीविंग इकाइयों में काम आने वाले प्लास्टिक बैग्स के दामों में 30 से 40 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है। उद्योगों के लिए ऊर्जा का प्रमुख स्रोत, इंडोनेशिया से आने वाला कोयला भी शिपिंग बाधाओं के कारण समय पर नहीं पहुंच पा रहा है।
कच्चे माल की अनुपलब्धता और महंगाई के इस दोहरे प्रहार के कारण उद्योगों की उत्पादन लागत में अनावश्यक रूप से 30 से 40 प्रतिशत तक का इजाफा हो गया है। टेक्सटाइल मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों, प्रोसेस हाउस और संबंधित उद्योगों का पहिया थमने के कगार पर है। संकट की इस घड़ी में अब पूरे उद्योग जगत की निगाहें केंद्र सरकार पर टिकी हैं। उद्यमियों को उम्मीद है कि सरकार जल्द ही इस गंभीर स्थिति का संज्ञान लेगी और कच्चे माल की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए कोई ठोस कूटनीतिक या आर्थिक कदम उठाएगी।