MP News: राजधानी में हर रोज डेढ़ टन ई-वेस्ट निकल रहा है। इसमें से केवल 10% का वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण हो रहा है। बाकी 250 कबाडिय़ों के हाथ हैं।
MP News: एमपी के भोपाल शहर में आधुनिकता की दौड़ और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के बढ़ते इस्तेमाल ने एक गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। शहर में वैज्ञानिक तरीके से ई-वेस्ट का निस्तारण न होना अब आम जनता की सेहत पर भारी पड़ रहा है। पुराने मोबाइल, कंम्प्यूटर और खराब इलेक्ट्रॉनिक सामान से निकल रही जहरीली धातुएं चुपचाप लोगों को गंभीर बीमारियों की ओर धकेल रही हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, जब इन खराब उपकरणों को कबाडिय़ों द्वारा खुले में जलाया या तोड़ा जाता है तो शीशा, पारा, कैडमियम, क्रोमियम और बेरिलियम जैसी जहरीली धातुएं निकलती हैं। इनसे बच्चों के मानसिक विकास में बाधा आती है और किडनी खराब होने का खतरा बढ़ जाता है।
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भोपाल में देश की पहली ई-वेस्ट क्लिनिक डंपिंग यार्ड में पड़ी है। पहली क्लिनिक का दावा कर नगर निगम ने निजी एजेंसियों के माध्यम से खूब वाहवाही लूटी थी, लेकिन जब लाभ नहीं हुआ तो यह कचरे के ढेर में बदल दी गई। नगर निगम, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और निजी एजेंसियों ने मिल 2020 में इसकी शुरुआत की थी। इसका सेंटर एक लो फ्लोर बस में बनाया गया। एक दिन में सौ किलो ई-वेस्ट के आधार पर तीन साल में सौ टन ई-वेस्ट जमा कर इसके माध्यम से डिस्पोज हुआ।
खराब कंम्प्यूटर से लेकर मोबाइल, चार्जर सहित सभी आइटम को यहां कलेक्ट किया जाता था। कचरे को डिस्पोज करने वाली यह क्लीनिक तीन साल में बंद हो गई। इसके पीछे मेट्रो ब्रिज के निर्माण को कारण बताया जा रहा है, जबकि हकीकत बजट की कमी रही। शहर में मुख्य रूप में 250 कबाड़ कारोबारी हैं। ई-वेस्ट में आग लगाने के मामले में इन पर कार्रवाई भी हो चुकी है।
राजधानी में हर रोज डेढ़ टन ई-वेस्ट निकल रहा है। इसमें से केवल 10% का वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण हो रहा है। बाकी 250 कबाडिय़ों के हाथ हैं। नष्ट करने के दौरान गैस और रसायन निकल रहे हैं। वर्तमान में राजधानी में आठ सौ से एक हजार किलो ई-वेस्ट जमा हो रहा है। कलेक्शन डोर टू डोर किया जाता है। ई-वेस्ट क्लीनिक बंद होने के बाद ये व्यवस्था की गई।
इलेक्ट्रॉनिक कचरे का लैंडफिल या अवैध डंपिंग क्षेत्रों में अनुचित निपटान रसायनों को मिट्टी में रिसने देता है, जिससे भूजल दूषित होता है और फसलें प्रभावित होती हैं। इस प्रदूषण का फसलों पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है, जिससे उत्पादकता में कमी व स्वास्थ्य संबंधी जोखिम उत्पन्न होते हैं।
-ई-वेस्ट को सामान्य कचरे या गीले कचरे के साथ मिलाना मना है।
-निर्माता कंपनी की जिम्मेदारी है कि वह अपना पुराना सामान वापस लेने का सिस्टम बनाए।
-केवल मान्यता प्राप्त रीसायकलर्स या 'ई-वेस्ट क्लिनिक' को ही कचरा देना अनिवार्य है।
-सरकारी दफ्तरों और बड़ी कंपनियों को अपने ई-वेस्ट का सालाना रिकॉर्ड रखना और ऑडिट कराना जरूरी है।
ई-वेस्ट क्लीनिक के लिए दूसरी जगह नहीं मिली। इस कारण यह डंपिंग यार्ड में है। हर रोज शहर से 100 किलो तक कचरा वैज्ञानिक तरीके से नष्ट हो पा रहा है। बाकी शहर में 250 कबाडिय़ों के पास है। जहां इसमें धातुओं के लिए जला दिया जाता है। इसमें कई खतरनाक गैस हवा में मिल रह है। इम्तियाज अली, सलाहकार, ठोस अवशिष्ट निष्तारण समिति मप्र
पत्रिका से शकील खान की रिपोर्ट…