छतरपुर में अंधविश्वास ने चिकित्सा को पीछे छोड़ दिया है। एक साल में 150 जानें गईं हैं। प्रशासनिक चुप्पी सवाल खड़े कर रही है।
मध्यप्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में अंधविश्वास आज भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। तकनीकी और आधुनिक चिकित्सा के इस दौर में भी लोग झाड़-फूंक, टोटके और तांत्रिक क्रियाओं से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। ये भ्रांतियां किस कदर व्याप्त हैं, इसका साक्षात उदाहरण छतरपुर जिला है, जहां अंधविश्वास के कारण एक वर्ष में 150 से अधिक लोग जान गंवा चुके हैं। इन लोगों को कोई समझाने वाला नहीं है और न ही कोई इन्हें बरगला कर अपना हित साधने व इतनी जिंदगियों को खत्म कर देने वालों को रोकने वाला।
समाज, पुलिस, प्रशासन और सरकार सब सोए हैं। किसी को किसी से कोई सरोकार नहीं है। और दुष्परिणाम व तकलीफें सिर्फ छतरपुर जिले तक सीमित नहीं हैं। राज्य के अन्य जिले भी अंधविश्वास की मार झेल रहे हैं। कई मामलों में चिकित्सा व्यवस्था पर झाड़-फूंक और टोटके भारी पड़ जाते हैं। लोग अंधविश्वास के चक्कर में अपना और अपनों का जीवन जोखिम में डाल देते हैं। परिणामस्वरूप इलाज के अभाव में हर साल सैकड़ों जिंदगियां दम तोड़ देती हैं।
ग्रामीण अंचलों में आज भी बीमारी को चिकित्सा समस्या मानने के बजाय ‘ऊपरी बाधा’ समझ लिया जाता है। कई बार सर्पदंश, बुखार, उल्टी-दस्त या मानसिक रोग जैसे मामलों में पहले ओझा-तांत्रिक के दरवाजे खटखटाए जाते हैं। जब तक परिवार को स्थिति की गंभीरता का एहसास होता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। अस्पताल पहुंचते-पहुंचते मरीज दम तोड़ देता है और जिम्मेदारी ‘भाग्य’ या ‘ईश्वर की मर्जी’ पर डाल दी जाती है। अंधविश्वास इतने हावी हैं कि लोग अस्पताल तक में टोने टोटके कर लेते हैं, इस आस में कि उनके परिजन की जान बच जाए।
कहने को सरकार ने जागरूकता अभियानों को प्रक्रिया का हिस्सा बनाया हुआ है, लेकिन इतनी संख्या में सामने आ रहे उदाहरण दर्शाते हैं कि सब कुछ कागजों में ही हो रहा है। इसे रोकना होगा और इसके लिए जरूरत है कि समाज, प्रशासन और जनप्रतिनिधि मिलकर कदम उठाएं। अंधविश्वास को सामाजिक अपराध की तरह देखा जाए। जब तक गांव-गांव में स्वास्थ्य शिक्षा नहीं पहुंचेगी और गलत मान्यताओं पर सख्ती नहीं होगी, तब तक अंधविश्वास से मौत की खबरें सुर्खियां बनती रहेंगी।