राजस्थान के 65 हजार सरकारी स्कूलों में फंड अटकने से संस्था प्रधानों की धड़कनें बढ़ी हुई है।
भावना सोलंकी। राजस्थान के 65 हजार सरकारी स्कूलों के संस्था प्रधानों की इन दिनों धड़कनें बढ़ी हुई हैं। वजह है वित्तीय वर्ष समाप्ति (31 मार्च) का नजदीक आना। स्कूलों में बिजली- पानी के बिल भरने से लेकर टॉयलेट क्लीनर तक की खरीद के लिए संस्था प्रधानों को सीएसजी (स्कूल कंपोजिट ग्रांट) मिलती है। इसका भुगतान बाद में मिलता है। स्कूल में एक अप्रेल से ही संस्था प्रधान जेब से व उधारी से खर्च चलाते है। वित्तीय वर्ष के अंत तक राशि मिल जाती है, तो वे उधारी चुका देते हैं। इस साल ग्रांट की 16% राशि ही स्कूलों को मिली है। जबकि वित्तीय वर्ष समाप्ति में महज 20 दिन शेष है।
दरअसल, सीएसजी में दिसंबर- जनवरी तक राशि जारी कर दी जाती है। इस साल स्कूलों को ग्रांट में 84% बजट जारी नहीं किया है। उलटा इस ग्रांट से खर्च की राशि का हिसाब विभाग मांग रहा है। खेल व अन्य गतिविधि के लिए स्कूल फैसिलिटी ग्रांट भी अब तक नहीं दी गई है।
जिन स्कूलों को फंड जारी नहीं किया गया है। उन स्कूलों को इसी सप्ताह राशि का भुगतान करने के निर्देश दे दिए हैं।- मदन दिलावर, शिक्षा मंत्री
सरकारी स्कूल को छात्र संख्या के आधार पर सालभर के खर्चों के लिए 50 से 75 हजार रुपए मिलते हैं। इससे बिजली-पानी के बिल भरने से लेकर बिजली उपकरणों, फर्नीचर, टॉयलेट सफाई, टूट-फूट हाजिरी रजिस्टर और स्टेशनरी की खरीद होती है। खर्च का बिल एसएनए पोर्टल पर फीड करना होता है। पोर्टल 31 मार्च को लॉक हो जाएगा।
राजस्थान शिक्षक संघ एवं संगठन राशि तुरंत जारी करने की मांग कर रहे हैं। वहीं, शिक्षा निदेशालय के अधिकारियों का कहना है कि राशि समग्र शिक्षा अभियान से जारी होती है। उनके कार्यक्षेत्र में नहीं है, जबकि पदेन अतिरिक्त राज्य परियोजना निदेशक (वरिष्ठ) समसा की जिम्मेदारी निदेशालय के पास ही हैं।