
Chhattisgarh High Court: कैदियों की समय पूर्व रिहाई के मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि समान अपराध और समान परिस्थितियों वाले कैदियों के मामलों में अलग-अलग मापदंड नहीं अपनाए जाने चाहिए। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने रिहाई प्रक्रिया में समानता के सिद्धांत को ध्यान में रखने के निर्देश दिए हैं। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से कहा है कि ऐसे मामलों में निष्पक्ष तरीके से विचार कर उचित निर्णय लिया जाए।
मामला जांजगीर-चांपा जिले के हत्या प्रकरण से जुड़ा है। याचिकाकर्ता रामफल कश्यप (48) को वर्ष 2012 में हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। वह पिछले कई वर्षों से बिलासपुर सेंट्रल जेल में बंद है। रामफल ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 473 के तहत समय पूर्व रिहाई के लिए आवेदन किया था। जेल विभाग ने मामले में जिला एवं सत्र न्यायाधीश से राय मांगी थी, लेकिन 25 मई 2026 को बिना स्पष्ट कारण बताए रिहाई के आवेदन पर नकारात्मक राय दे दी गई।
याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट (Bilaspur High Court) में दलील दी कि इसी मामले में सह-आरोपी राकेश केवट की भूमिका भी समान थी, लेकिन उसके रिहाई आवेदन पर सकारात्मक राय दी गई। जबकि रामफल के मामले में बिना ठोस वजह के आपत्ति जताई गई। याचिकाकर्ता ने इसे भेदभावपूर्ण बताते हुए समानता के अधिकार का उल्लंघन बताया। वहीं राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि जिला न्यायालय की राय केवल एक प्रक्रिया का हिस्सा है, अंतिम निर्णय सरकार को लेना है।
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि दोनों आरोपी एक ही घटना से जुड़े हैं और अपराध की परिस्थितियां समान हैं। ऐसे में एक आरोपी को राहत देने और दूसरे के मामले में अलग दृष्टिकोण अपनाने पर दोबारा विचार जरूरी है। कोर्ट ने सीधे निचली अदालत की राय रद्द नहीं की, बल्कि जेल विभाग को निर्देश दिया कि सह-आरोपी को मिली सकारात्मक रिपोर्ट को ध्यान में रखते हुए रामफल कश्यप के आवेदन पर कानून के अनुसार जल्द फैसला लिया जाए।
हाईकोर्ट ने कहा कि समय पूर्व रिहाई के मामलों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए नियमों का पालन किया जाना चाहिए। कोर्ट ने लक्ष्मण नस्कर बनाम भारत संघ मामला और राम चंद्र बनाम छत्तीसगढ़ राज्य मामला जैसे मामलों में दिए गए दिशा-निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने को कहा।
हाईकोर्ट ने गृह (जेल) विभाग को निर्देश दिया है कि पूरे मामले की समीक्षा कर समानता के आधार पर उचित निर्णय लिया जाए। कोर्ट के इस आदेश के बाद कैदियों की समय पूर्व रिहाई प्रक्रिया में पारदर्शिता और समान मापदंड को लेकर चर्चा तेज हो गई है।