CG High Court: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एससी/एसटी एक्ट मामले में आरोपी पत्रकार मोहन निषाद को जमानत देते हुए ट्रायल कोर्ट का आदेश निरस्त कर राहत प्रदान की।
CG High Court: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एससी/एसटी एक्ट से जुड़े एक मामले में आरोपी पत्रकार मोहन निषाद को महत्वपूर्ण राहत देते हुए जमानत प्रदान कर दी है। जस्टिस राधाकिशन अग्रवाल की एकलपीठ ने मामले की विस्तृत सुनवाई के बाद ट्रायल कोर्ट द्वारा पूर्व में दिए गए आदेश को निरस्त कर दिया।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करते हुए पाया कि मामले की परिस्थितियों, आरोपी की न्यायिक हिरासत की अवधि और ट्रायल में संभावित देरी को देखते हुए जमानत देना उचित है। इस फैसले के साथ ही आरोपी को अंतरिम राहत मिल गई है, हालांकि मामले की सुनवाई निचली अदालत में जारी रहेगी और अंतिम निर्णय ट्रायल के आधार पर ही लिया जाएगा।
मामला बालोद जिले के डौंडीलोहारा थाना क्षेत्र से जुड़ा है, जहां मोहन निषाद के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं और एससी/एसटी एक्ट के तहत अपराध दर्ज किया गया था। शिकायतकर्ता मनीराम तारम, जो छत्तीसगढ़ स्टेट पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड में सहायक अभियंता हैं, ने आरोप लगाया था कि आरोपी ने खबर प्रकाशित करने की धमकी देकर 2 लाख रुपए की मांग की।
शिकायत में यह भी कहा गया कि रकम नहीं देने पर आरोपी ने जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया, धमकाया और सोशल मीडिया के माध्यम से छवि खराब करने की कोशिश की। पुलिस ने इस आधार पर मोहन निषाद और एक अन्य आरोपी के खिलाफ मामला दर्ज कर जांच शुरू की थी।
बचाव पक्ष ने कोर्ट में दलील दी कि मोहन निषाद एक पत्रकार हैं और उन्होंने केवल एक बच्चे की करंट से मौत की खबर प्रकाशित की थी। इसी वजह से रंजिश के चलते उनके खिलाफ झूठा मामला दर्ज कराया गया। साथ ही घटना के करीब चार महीने बाद एफआईआर दर्ज होना भी संदेह पैदा करता है।
कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद यह पाया कि आरोपी 18 मार्च 2026 से न्यायिक हिरासत में है और मामले के ट्रायल में अभी समय लग सकता है। ऐसे में लंबी अवधि तक हिरासत में रखना उचित नहीं मानते हुए न्यायालय ने परिस्थितियों को ध्यान में रखकर आरोपी को जमानत देने का निर्णय लिया।
हाईकोर्ट के इस फैसले से आरोपी को अंतरिम राहत मिली है, हालांकि मामले की सुनवाई ट्रायल कोर्ट में जारी रहेगी। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यह आदेश केवल जमानत से संबंधित है और मामले के अंतिम निर्णय पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।