
भारत में सड़क हादसों में प्रतिवर्ष लाखों लोगों की मौत हो जाती है। कार्डियोलॉजिस्ट के अनुसार अधिकतर घायलों को 'गोल्डन आवर' में सही इलाज न मिलने से उनकी मौत हो जाती है। घटनास्थल से अस्पताल पहुंचने में जितना ज्यादा समय लगता है, मरीज के बचने की उम्मीद उतनी ही कम होती चली जाती है। ऐसे में यदि अमरीका की तर्ज पर भारत में भी पैरामेडिक्स को प्रशिक्षित कर एंबुलेंस में नियुक्त किया जाए तो मृत्यु दर को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
पैरामेडिक्स की भूमिका -
अमरीका में 2-3 वर्ष का मेडिकल प्रशिक्षण देकर लोगों को पैरामेडिक्स के रूप में तैयार किया जाता है व इनकी तैनाती एंबुलेंस पर की जाती है। ये पैरामेडिक्स अस्पताल, कार्डियोलॉजी व इमरजेंसी के डॉक्टरों के संपर्क में रहते हैं। सड़क या किसी अन्य स्थान पर दुर्घटना होने पर ये मरीज को अस्पताल ले जाने के साथ उस बीच के 'गोल्डन आवर' में घायल को डॉक्टर के निर्देशानुसार तात्कालिक रूप से इलाज उपलब्ध कराते हैं जिससे व्यक्ति के जीवित रहने की अवधि (सर्वाइवल पीरियड) बढ़ जाती है और उसे इलाज के लिए अस्पताल तक सुरक्षित पहुंचाने में मदद मिलती है।
इसलिए है जरूरत -
दुर्घटनाओं में घायल व्यक्ति के शरीर से काफी खून बह जाता है। ऐसे में स्थिति को नियंत्रित करने के लिए खून के बहाव को तुरंत रोकना बहुत जरूरी होता है। वहीं हार्ट अटैक के दौरान रक्तसंचार अवरुद्ध होने से भी हृदय की गति प्रभावित होकर बिगड़ जाती है और धड़कनें अनियंत्रित हो जाती हैं। इस स्थिति में पांच से दस मिनट का समय बहुमूल्य होता है। यदि इस समय में हृदय की धड़कनों को नियंत्रित न किया जाए तो व्यक्ति को बचाना बहुत मुश्किल हो जाता है। पैरामेडिक्स, डॉक्टर के द्वारा दिए निर्देशानुसार मरीज को तुरंत इलाज उपलब्ध कराकर स्थिति को संभाल लेते हैं। जिससे मरीज अस्पताल तक का रास्ता बिना किसी खतरे के पार कर लेता है।
महत्वपूर्ण है गोल्डन आवर -
किसी भी गंभीर परिस्थिति में मरीज के लिए दुर्घटना के बाद का एक घंटा बेहद अहम होता है। इस समय में दिया गया इलाज उसकी जिंदगी को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसलिए इसे 'गोल्डन आवर' कहा जाता है। भारत में हैदराबाद व बेंगलुरु जैसे शहरों को छोड़कर अधिकतर जगहों पर एंबुलेंस में प्रशिक्षित लोगों की कमी है। जिससे गोल्डन आवर का सही उपयोग नहीं हो पाता और अधिकांश लोग दुर्घटना के बाद दम तोड़ देते हैं।