
बच्चे अक्सर दूध पीने के तुरंत बाद उल्टी कर देते हैं। छह हफ्ते की उम्र तक ऐसा आहार नली का निचला हिस्सा पूरी तरह से विकसित न होने से होता है। जो सामान्य है। इसे जीईआर (गेस्ट्रोइसोफीगल रिफ्लक्स) कहते हैं। शिशु में ऐसा दूध निगलने की समझ न होने, खेलतेे, हंसते समय पेट में हवा जाने, अधिक दूध पिलाने से होता है। छह हफ्ते की उम्र के बाद या पहले भी यदि वह कुछ घूंट या खाया-पीया पूरा उल्टी कर निकाल दे तो इसे जीईआरडी (गेस्ट्रोइसोफीगल रिफ्लक्स डिजीज) कहते हैं।
कई बार उल्टी करने से खाद्य सामग्री सांस नली में चली जाती है। इस कारण बच्चे को खांसी, एस्पिरेशन निमोनिया और सांस उखड़ने जैसी तकलीफें होने की आशंका बढ़ जाती है।
ये हैं कारण : जन्मजात पेट व आहारनली की विकृति, डायफ्राम की संरचना में गड़बड़ी, आहारनली की मांसपेशियों के कमजोर होने, मानसिक असंतुलन व हर्निया वजह हैं। कई बार परेशानी के बढ़ने पर बच्चे पेट दर्द के कारण रोते भी रहते हैं जिसे वह जाहिर नहीं कर पाते।
पोषक तत्त्वों की कमी : बार-बार या लगातार उल्टी से बच्चों में पानी व पोषक तत्त्वों का अभाव, वजन न बढ़ने व विकास न होने जैसी समस्याएं होने लगती हैं।
इलाज -चार तरह से बच्चे का उपचार करते हैं। जिसमें पोजिशनिंग थैरेपी, खानपान, ड्रग और सर्जरी को अपनाया जाता है।
पोजिशनिंग थैरेपी : बच्चा दूध पीते ही उल्टी न करे इसके लिए मां की काउंसलिंग की जाती है। इसमें उसे ब्रेस्टफीड कराने के बाद बच्चे को 15-20 मिनट लेटाने के लिए मना करते हैं। डकार दिलाने के लिए थोड़ी देर कंधे से लगाकर या पैरों पर उल्टा सुलाकर पीठ पर हल्की थपकी देने की सलाह देते हैं।
अधिक लिक्विड से परहेज : ज्यादा तरल पदार्थ देने की बजाय गाढ़ी चीजें देते हैं।
दवाएं: आंतों की कार्यक्षमता बढ़ाने के लिए दवाइयां दी जाती हैं।
सर्जरी: आहारनली, पेट या आंतों में यदि किसी प्रकार की गड़बड़ी या विकृति पाई जाती है तो ऑपरेशन कर उसे सही किया जाता है।