
जिला अस्पताल में इलाज कराने पहुंच रहे मरीजों और उनके परिजनों को चिकित्सा सुविधा के साथ-साथ बुनियादी व्यवस्थाओं के लिए भी परेशान होना पड़ रहा है। अस्पताल के कई वार्डों में मरीजों के पलंग पर चादर तक उपलब्ध नहीं है, वहीं गंभीर मरीजों को वार्ड तक पहुंचाने के लिए पर्याप्त स्ट्रेचर भी नहीं मिल रहे। ऐसे में कई बार परिजन मरीज को गोद में उठाकर वार्ड तक ले जाने को मजबूर हो रहे हैं। अस्पताल की व्यवस्थाओं की हकीकत यह है कि तीसरी और चौथी मंजिल के ट्रॉमा वार्ड सहित अन्य वार्डों में भर्ती मरीजों को कई बार बिना चादर के पलंग पर इलाज कराना पड़ रहा है। मजबूरी में परिजन घर से चादर और बिस्तर लेकर अस्पताल पहुंच रहे हैं। जिन सुविधाओं की जिम्मेदारी अस्पताल प्रबंधन की है, उनके लिए मरीजों के परिजनों को अपनी व्यवस्था करनी पड़ रही है।चादर के लिए घर पर निर्भर मरीजअस्पताल में मरीजों को साफ-सुथरी चादर उपलब्ध कराने के लिए मैकेनाइज्ड लॉन्ड्री की व्यवस्था की गई है। इसके लिए करीब 40 लाख रुपए की लागत से लॉन्ड्री भवन तैयार किया गया था। चादरों और संबंधित व्यवस्थाओं को मिलाकर इस पूरी व्यवस्था पर करीब 60 लाख रुपए से अधिक खर्च होने की बात सामने आई है। व्यवस्था के तहत मरीजों को नियमित रूप से साफ चादर उपलब्ध कराई जानी थी, लेकिन वर्तमान स्थिति में कई पलंग चादर के बिना ही नजर आते हैं। ऐसे में मरीजों को घर से चादर मंगवाकर काम चलाना पड़ रहा है।
अस्पताल में मरीजों को रोजाना साफ और निर्धारित रंग की चादर उपलब्ध कराने की व्यवस्था बनाई गई थी। सप्ताह के अलग-अलग दिनों के लिए अलग रंग तय किए गए थे। सोमवार को गोल्डन यलो, मंगलवार को आसमानी, बुधवार को लाल, गुरुवार को लेमन यलो, शुक्रवार को ब्रिलिएंट रेड, शनिवार को चॉकलेट और रविवार को हरे रंग की चादर बिछाई जानी थी, लेकिन मौजूदा स्थिति में रंग तो दूर, कई मरीजों को सामान्य चादर भी उपलब्ध नहीं हो पा रही है। इससे अस्पताल की साफ-सफाई और मरीजों की बुनियादी सुविधाओं को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।
अस्पताल की सबसे बड़ी परेशानियों में स्ट्रेचर की कमी भी सामने आ रही है। गंभीर या चलने में असमर्थ मरीजों को वार्ड तक पहुंचाने के लिए जब स्ट्रेचर उपलब्ध नहीं होता तो परिजन उन्हें गोद में उठाकर ले जाने को मजबूर हो जाते हैं। अस्पताल की अलग-अलग मंजिलों पर इलाज के लिए पहुंचने वाले मरीजों के परिजन स्ट्रेचर तलाशते नजर आते हैं। समय पर स्ट्रेचर नहीं मिलने पर कई बार परिवार के सदस्य ही मरीज को सहारा देकर या गोद में उठाकर वार्ड तक ले जाते हैं। गंभीर हालत वाले मरीजों के लिए यह स्थिति और भी परेशानी बढ़ाने वाली है।
अस्पताल परिसर में करीब 3500 वर्गफीट में लॉन्ड्री भवन बनाया गया है। इसमें कपड़े धोने, सुखाने, प्रेस करने, छांटने और रजिस्ट्रेशन के लिए अलग-अलग व्यवस्थाएं की गई हैं। भवन में सात कमरे, हॉल और अन्य सुविधाएं भी हैं। यहां कर्मचारियों की तैनाती भी है, इसके बावजूद वार्डों में मरीजों को नियमित रूप से चादर उपलब्ध नहीं हो रही है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब अस्पताल में चादरों की धुलाई और वितरण के लिए पूरी व्यवस्था मौजूद है तो फिर मरीजों के पलंग तक चादर क्यों नहीं पहुंच रही है।
वार्डों में अव्यवस्थाएं केवल चादर तक सीमित नहीं हैं। मरीजों के पलंग के आसपास भी कई स्तर पर लापरवाही देखने को मिल रही है। मरीजों को लगाई गई बोतल खत्म होने के बाद भी कई बार स्टैंड वार्ड में ही पड़ा रहता है। नियमानुसार बोतल खत्म होने के बाद उसे हटाने की जिम्मेदारी संबंधित नर्सिंग स्टाफ की होती है। मरीजों और उनके परिजनों का कहना है कि अस्पताल में इलाज के लिए आने के बाद उन्हें कई छोटी-बड़ी व्यवस्थाओं के लिए कर्मचारियों के पीछे भागना पड़ता है। इससे सबसे ज्यादा परेशानी दूर-दराज से आने वाले गरीब और गंभीर मरीजों को होती है।
जिला अस्पताल जिले का सबसे बड़ा सरकारी उपचार केंद्र है, जहां रोजाना बड़ी संख्या में मरीज पहुंचते हैं। ऐसे में चादर, स्ट्रेचर और वार्ड की मूलभूत सुविधाओं की उपलब्धता अस्पताल की प्राथमिक जिम्मेदारी है। लेकिन वर्तमान स्थिति में मरीजों को इन सुविधाओं के लिए भी परेशान होना पड़ रहा है।इनका कहना हैमामला आपके माध्यम से संज्ञान में आया है। मैं आज ही अस्पताल का निरीक्षण करूंगा और लॉन्ड्री स्टाफ को निर्देशित किया जाएगा कि सभी मरीजों को नियमानुसार साफ चादर उपलब्ध कराई जाए। स्ट्रेचर और अन्य व्यवस्थाओं की भी स्थिति देखी जाएगी।
डॉ. आरपी गुप्ता, सीएमएचओ, छतरपुर