क्रिकेट

महज 17 साल की उम्र में 1,000 रन पूरे कर रचा इतिहास, फिर कार हादसे ने हमसे छीन लिया था ‘अगला तेंदुलकर’

80 के दशक के आखिर में जब सचिन तेंदुलकर बॉम्बे में आगे बढ़ रहे थे तो वहीं नॉर्थ में ध्रुव पांडोव भी अपनी चमक बिखेर रहे थे। ध्रुव ने महज 13 साल की उम्र में रणजी में डेब्‍यू किया और कई रिकॉर्ड बनाए। लेकिन, सिर्फ 18 साल की उम्र में हुए एक सड़क हादसे में उनकी मौत हो गई।
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Nov 29, 2025
dhruv pandove
पंजाब के पूर्व क्रिकेटर ध्रुव पांडोव। (फोटो सोर्स: एक्‍स@/IDCForum)

क्रिकेट में सचिन तेंदुलकर की तरह कई चमकते हुए सितारे हुए हैं, जिन्‍हें दुनिया जानती है। लेकिन, क्‍या आप जानते हैं कि कई ऐसे सितारे भी आए, जो फलक पर चमकने से पहले ही गुम हो गए। इन्‍हीं में से एक थे पंजाब के पूर्व क्रिकेटर ध्रुव पांडोव, जिनकी तुलना तेंदुलकर से होती थी। 80 के दशक के आखिर में जब सचिन तेंदुलकर बॉम्बे में आगे बढ़ रहे थे, वहीं नॉर्थ में ध्रुव कुछ ऐसा ही कर रहे थे कि उन्‍हें भारत का अगला बड़ा खिलाड़ी माना जाने लगा था। वह एक ऐसा टैलेंट थे, जिसके बारे में बड़े-बड़े लोग फुसफुसाकर बात करते थे और सेलेक्टर चुपचाप मुस्कुराते थे।

13 साल की उम्र में रणजी डेब्‍यू

ध्रुव जब सिर्फ 13 साल के थे, तब उन्होंने रणजी ट्रॉफी में पंजाब के लिए डेब्‍यू किया था। एक स्कूल का लड़का ऐसे लोगों के खिलाफ मैदान में उतरा, जिनकी मूंछें थीं और जिन्हें सालों का अनुभव था। अपने तीसरे ही मैच में उन्होंने सेंचुरी बनाई। ऐसा करने वाले वह सबसे कम उम्र के भारतीय थे। हालांकि उससे कुछ महीने पहले वह डेब्यू पर शतक बनाने से छह रन से चूक गए थे। वह अपने टैलेंट के बारे में ज्‍यादा बात नहीं थे। वह गेम में शांत और सिंपल रहते थे।

पंजाब में सचिन से आगे लिया जाता था नाम

चौदह साल की उम्र तक पंजाब में लोग सचिन के आगे उनका नाम लेने लगे थे। तुलना के तौर पर नहीं, बल्कि एक उम्मीद के तौर पर। कई अच्छे डोमेस्टिक सीजन के बाद उन्हें इंडिया अंडर-19 के लिए चुना गया। उन्होंने पाकिस्तान, बांग्लादेश, इंग्लैंड का दौरा किया। कोच उनके बैलेंस, उनके शांत स्वभाव, उनके सब्र की बातें करते थे।

1000 रणजी रन पार करने वाले सबसे कम उम्र के खिलाड़ी

दिसंबर 1991 में, वह 1000 रणजी रन पार करने वाले सबसे कम उम्र के भारतीय बने। उस महीने उन्होंने शानदार 170 रन बनाए। फिर नॉर्थ जोन की अंडर-19 टीम को सीके नायडू ट्रॉफी दिलाई, जिसमें उन्होंने सेमीफाइनल और फाइनल में 73 और 87 रन बनाए। वह सिर्फ 17 साल के थे, लेकिन कुछ बड़ा करने के लिए तैयार लग रहे थे। यह सबको पता था। शायद उन्हें भी पता था।

ध्रुव की आखिरी पारी

जनवरी 1992 में ध्रुव ने नॉर्थ जोन के लिए देवधर ट्रॉफी खेली। विरोधी टीम में अनिल कुंबले और वेंकटेश प्रसाद थे। ध्रुव ने उन्हें खूबसूरती से संभाला और 73 रन बनाए। भले वह मुकाबला उनकी टीम हार गई, लेकिन इस प्रदर्शन के लिए उन्‍हें प्लेयर ऑफ द मैच के खिताब से नवाजा गया। उस रात किसी को नहीं पता था कि यह उनकी आखिरी पारी होगी।

ध्रुव ने नहीं मानी चेतन शर्मा की बात

टूर्नामेंट के बाद टीम दिल्ली लौट आई। वहां से पंजाब और हरियाणा जाने वाले खिलाड़ियों ने एक साथ ट्रेन ली। चेतन शर्मा उनके साथ थे। मौसम खराब था, घना कोहरा था, सड़कों पर दृश्‍यता बहुत कम थी। चेतन ने ध्रुव को सुबह तक रुकने के लिए कहा। लेकिन, वह नहीं माने। वह अपने माता-पिता को सरप्राइज देना चाहते थे। अगला टूर शुरू होने से पहले उनसे मिलना चाहते थे। उनके पिता ने बाद में बताया कि ध्रुव ने कहा था कि अगर मैं अगले कुछ गेम में अच्छा करूंगा, तो मुझे टीम इंडिया से बुलावा आ सकता है।

कार हादसे में चली गई जान

वह स्टेशन से निकले और एक कैब हायर की, लेकिन घर नहीं पहुंच पाए। अंबाला के पास उनकी कार हादसे का शिकार हो गई थी। इस दुर्घटना में ध्रुव और कार चालक दोनों की जान चली गई। इस तरह सिर्फ 18 साल की उम्र में देश ने एक उभरता हुआ सितारा खो दिया।

सदमा बर्दाश्‍त नहीं कर सका परिवार

जब यह खबर पटियाला पहुंची तो जैसे सब कुछ थम सा गया। उनके पिता एमपी पांडोव, जो पंजाब क्रिकेट के सबसे जाने-माने एडमिनिस्ट्रेटर्स में से एक थे, पूरी तरह टूट गए। वह हमेशा के लिए क्रिकेट छोड़ना चाहते थे। उनके छोटे भाई कुणाल, जो उनके जैसा बनने का सपना देखते थे, उन्‍होंने भी दोबारा बल्ला नहीं उठाया। उनकी मां इस सदमे से टूट गईं, उन्होंने उनकी क्रिकेट किट जला दी।

क्रिकेट की दुनिया ने भी गहराई से महसूस किया दर्द

यहां तक ​​कि क्रिकेट की दुनिया ने भी इस दर्द को गहराई से महसूस किया। उस समय इंडिया पर्थ में एक टेस्ट खेल रही थी। कमेंटेटर्स ने उनका नाम लिया। बीबीसी ने इसे टिकर पर चलाया। लेकिन, जो लोग उन्हें जानते थे, उनके लिए इस नुकसान को शब्दों में बयां करना आसान नहीं था।

परिवार ने नहीं मिटने दिया नाम

साल बीत गए, लेकिन पांडोव परिवार ने उनका नाम मिटने नहीं दिया। 1994 में उन्होंने युवा क्रिकेटरों की मदद के लिए ध्रुव पांडोव ट्रस्ट बनाया और ब्लड डोनेशन कैंप लगाए। पटियाला के बारादरी ग्राउंड का नाम बदलकर ध्रुव पांडोव स्टेडियम कर दिया गया। पंजाब क्रिकेट एसोसिएशन कई सालों से ध्रुव पांडोव ट्रॉफी दे रहा है, ताकि उस नौजवान की याद हमेशा ताजा रहें, जिसने कभी अपने टैलेंट से नॉर्थ इंडियन क्रिकेट ग्राउंड्स को रोशन किया था।

ध्रुव के लिए सचिन के शब्द

सालों बाद सचिन तेंदुलकर ने कुछ ऐसा कहा जो याद रह गया। उन्‍होंने कहा कि मेरे शुरुआती क्रिकेट के दिनों में ध्रुव के साथ मेरे जुड़ाव का मेरे सफर पर बहुत असर पड़ा। सचिन शायद ही कभी भावुक होते हैं। जब उन्होंने ऐसा कहा, तो लोगों ने सुना। यह कोई पुरानी यादें नहीं थीं। यह सम्मान था। किसी ऐसे व्यक्ति के लिए जो उनके साथ हो सकता था, भारतीय क्रिकेट इतिहास के उस बड़े हिस्से को शेयर कर सकता था।

Updated on:
29 Nov 2025 08:29 am
Published on:
29 Nov 2025 08:29 am