आचार्य विजय रत्नसेन सूरीश्वर ने कहा कि ज्ञान की प्राप्ति गुरु के बिना नहीं होती। ज्ञान पाने के लिए गुरु के प्रति विनय और बहुमान भाव धारण करना चाहिए।
कोयम्बत्तूर. आचार्य विजय रत्नसेन सूरीश्वर ने कहा कि ज्ञान की प्राप्ति गुरु के बिना नहीं होती। ज्ञान पाने के लिए गुरु के प्रति विनय और बहुमान भाव धारण करना चाहिए। विनय अर्थात शरीर में होने वाला उचित आचरण। विनय के साथ बहुमान जरुरी है।
उन्होंने Coimbatore आर एस पुरम स्थित राजस्थानी संघ भवन Rajasthani sangh bhawan में चातुर्मास प्रवचन के दौरान कही। उन्होंने कहा कि वीतराग परमात्मा ने धर्मदेशना के माध्यम से संसार की भयानकता व मोक्ष की सुंदरता का ज्ञान दिया। आचार्य ने कहा कि संसार से मुक्त होने व मोक्ष प्राप्त करने के लिए पंाच प्रकार के आचार बताए गए हैं। इनमें ज्ञानाचार,दर्शनाचार,चरित्राचार, तपाचार व वीर्याचार शामिल हैं। इनके पालन से मोक्ष प्राप्ति संभव है।
उन्होंने कहा कि आत्मा का मूल स्वभाव है अनंत ज्ञान लेकिन कर्मों के आवरण से हमारी आत्मा अज्ञान से घिरी हुई है। इस आवरण को दूर करने के लिए ज्ञान की आराधना करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि गुरु के प्रति बहुमान का अर्थ उनके प्रति सत्कार सम्मान का भाव। यह तभी आएगा जब स्वयं को अल्पज्ञता व उनकी विशेष ज्ञानज्ञता का भाव रखा जाए। हृदय के भीतर बहुमान का भाव होता है तो वह स्वत: ही विनय हो जाता है। ऐसा भाव नहीं होगा तो ज्ञान होने के बावजूद आत्माकल्याण के मार्ग पर आगे नहीं बढ़ सकेगी। गुरु की भक्ति सेवा आत्मा का वीतराग परमात्मा के साथ जोड़ती है। ज्ञान, ध्यान, तप व जप की साधनाएं गुरु के प्रति समर्पण भाव के बाद ही फलीभूत होती हैं। सद्गुरू आत्मगुणों के रक्षक व अंतरंग शत्रुओं के नाशक है। गुरु बिना संसार रूपी भव सागर पार करना मुश्किल है।