MP News: सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि ईपीएफओ ने 15 मई 2020 को जारी अपने ही सर्कुलर की अनदेखी की।
MP News: कोविड-19 लॉकडाउन अवधि के दौरान कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ) अंशदान जमा करने में हुई देरी को लेकर हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण राहत दी है। जस्टिस जीएस अहलुवालिया और जस्टिस पुष्पेंद्र यादव की युगलपीठ ने कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) को निर्देश दिए है कि मार्च 2020 से 31 मार्च 2021 तक की अवधि के लिए लगाए गए दंड और ब्याज की गणना नए सिरे से की जाए। यह आदेश भिंड जिले के मालनपुर स्थित मैसर्स त्रिमूर्ति मेटल इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड की याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया गया।
कंपनी ने ईपीएफओ द्वारा जारी वसूली नोटिस को चुनौती देते हुए कहा था कि कोविड महामारी और लॉकडाउन के कारण उद्योग को भारी आर्थिक नुकसान हुआ, जिससे समय पर ईपीएफ अंशदान जमा नहीं हो सका। इसके बावजूद विभाग ने भारी दंड और ब्याज लगा दिया। सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि ईपीएफओ ने 15 मई 2020 को जारी अपने ही सर्कुलर की अनदेखी की।
सर्कुलर में स्पष्ट कहा गया था कि लॉकडाउन के दौरान अंशदान जमा करने में हुई देरी पर दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए, क्योंकि यह परिस्थितिजन्य मजबूरी थी और इसमें नियोक्ता की कोई गलत मंशा नहीं थी। हालांकि याचिकाकर्ता ने खराब स्वास्थ्य और दुर्घटना का हवाला देते हुए पूरी बकाया राशि माफ करने की मांग की, लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया।
अदालत ने कहा कि जिस अवधि का दंड मांगा गया है, उस समय याचिकाकर्ता स्वस्थ था, जबकि उसका ऑपरेशन जुलाई 2023 में हुआ था। कोर्ट ने मार्च 2020 से 31 मार्च 2021 तक की दंड और ब्याज वसूली पर फिलहाल रोक लगा दी है। साथ ही याचिकाकर्ता को 16 जून 2026 को क्षेत्रीय भविष्य निधि आयुक्त कार्यालय, ग्वालियर में उपस्थित होने के निर्देश दिए हैं। विभाग को इसके एक माह के भीतर पूरी प्रक्रिया पूर्ण करनी होगी।
वहीं हाईकोर्ट की युगल पीठ ने बच्चों की कस्टडी से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए बच्चों को मां के साथ रखने का आदेश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मासूम बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए मां का सानिध्य और ममता अनिवार्य है।
पति द्वारा पेश किए गए स्क्रीनशॉट पर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा कि अगर वह अपने दोस्त का हाथ भी पकड़े हुए है, तो भी इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलेगा कि वह व्यभिचारी जीवन जी रही है। केवल एक फोटो के आधार पर यह मान लेना गलत है कि महिला का आचरण खराब है, क्योंकि फोटो में दिख रहा व्यक्ति उसका भाई, पिता या कोई मित्र भी हो सकता है। पति को कोर्ट ने फटकार भी लगाई। कोर्ट ने 15 हजार रुपए भरण पोषण दिए जाने का आदेश भी दिया है।