इस दौरान 107 वर्षीय कराहल के स्वतंत्रता संग्राम सैनानी रामसेवक पाठक की मुलाकात भी उनसे हुई। ऐसा जिले के इकलौते जीवित स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रामसेवक
ग्वालियर/श्योपुर। देश की आजादी के लिए हंसते हुए अपने प्राण न्यौछावर करने वाले देश के वीर सपूत क्रांतिकारी सरदार भगत सिंह श्योपुर के कराहल के जंगलों में भी आए। यहां न सिर्फ वह अंग्रेजों से छुपकर कुछ दिन तक रुके रहे बल्कि उन्होंने अपने साथियों संग बैठक कर रणनीतियां भी तैयार की। इसदौरान 107 वर्षीय कराहल के स्वतंत्रता संग्राम सैनानी रामसेवक पाठक की मुलाकात भी उनसे हुई। ऐसा जिले के इकलौते जीवित स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रामसेवक पाठक बताते हैं।
स्वतंत्रता संग्राम सैनानी रहे रामसेवक पाठक बताते हैं कि आजादी के लिए वर्ष 1926-28 में जब आंदोलन चल रहा था, तब कराहल में भी दयाशंकर शुक्ला करके एक क्रांतिकारी मौजूद थे। यहां संचालित मिडिल स्कूल के प्रधान अध्यापक के बेटे शुक्ला का वारंट भी निकला हुआ था, बावजूद इसके वह कराहल क्षेत्र में रहकर अपनी गतिविधियां चलाते थे। अंग्रेजों से छिपने और अपने इस क्रांतिकारी साथी से मिलने के लिए ही सरदार भगत सिंह कराहल आए थे और यहां के जंगल में दो दिन तक रुके रहे थे। इसदौरान उनके साथ तीन लोग और थे, जिनकी यहां कराहल के जंगल में बैठक भी हुई। बकौल रामसेवक पाठक जब उनकी उम्र १२ साल के करीब थी और वह ज्यादा कुछ जानते नहीं थे, किंतु इसके बाद भी दयाशंकर शुक्ला के सौजन्य से उन्हें सरदार भगत सिंह को देखने का सुअवर प्राप्त हुआ था।
स्वतंत्रता संग्राम सैनानी रामसेवक पाठक की माने तो उनकी उम्र कम थी, किंतु इसी का फायदा उन्हें मिलता था। दयाशंकर शुक्ला उनसे उनके कराहल आने के समय पर पहरेदारी कराते थे। बच्चा होने की वजह से उन पर कोई शक भी नहीं करता था, सरदार भगत सिंह जब आए थे, तब भी क्रांतिकारी दयाशंकर शुक्ला ने हमसे उनके कराहल के मिडिल स्कूल में उनके कक्ष में आने के वक्त पहरेदारी कराई थी और जब वह जंगल जाने लगे तब, हमें ले जाकर उन्हें दिखाया और बताया कि ये सरदार भगत सिंह हैं।
स्थान को पार्क में बदले जाने की मांग उठाई
स्वतंत्रता संग्राम सैनानी पाठक ने सरदार भगत सिंह के आने और कराहल के जंगल में रुकने वाले स्थान को पर्यटन एवं पार्क आदि के स्वरूप में बदले जाने की मांग की है। इसको लेकर वो जिला प्रशासन को कई बार पत्र भी लिख चुके हैं। हालांकि अभी यह स्थान गुमनामी का शिकार है, किंतु स्वतंत्रता दिवस के आने के अवसर पर कराहल के लोगों के बीच इस वीर नायक की गाथाएं चर्चाओं में आ ही जाती हैं और लोग आज भी आजादी के इस वीर सपूत के अंग्रेजों के छक्के छुड़ाने और अपनी रणनीति को बनाने के लिए कराहल के जंगल तक में आ जाने की बातें नौजवान और बच्चों को बड़े ही गर्व के साथ बताते हैं।