इंदौर

मनक तो मनक रेवे,मशीन रो कई भरोसो…!

Aug 13, 2026
datia news
datia news (भाई ने की भाई की हत्या Photo Source- Patrika)

मनक तो मनक रेवे,मशीन रो कई भरोसो...!



दगाबाज रे... थारा नैणा बड़ा दगाबाज रे...। यो गाणो सुनतां-सुनतां मन का माय बात आई कि कई बस नैणा ज दगाबाज है...? नी म्हारा भई...! बस नैणा ज नी,मनक बी दगाबाज है। ने अब तो म्हूं ई बात ठोक-बजई कई सकूं के मनक ज नी, पण मनक री जिनगी का माय, मनक री खुद री मरजी ती घुस बेठ्या ने पूरो राज जमई रिया गूगल अंकल-आंटी तो मनक ती बी मोटा दगाबाज निकल्या।मशीनां ने बी असी दगाबाजी करी के मनक बी लजई जावे।मनक रो ढंग ई ऐसो हो ग्यो हे के मनक पे भरोसो नी करै, पण मशीन पर आंख मूंदी ने भरोसो करे। कोई मनक रेवे नी.., पूरा सई-साट रस्तो बतावै, दायो-बायो समझावै, फेर बी भरोसो नी। पण मशीन कई दे तो बस आखरी बात। म्हारे तो लागै है मनक खुद मशीनी हो ग्यो है, इ वास्ते मनक ती ज्यादा भरोसो मशीन पे करै। तीन पीढ़ी ती इलाज करि रिया डॉक्टर साब जो कई दे,वणी पे भरोसो कोनी। पण गूगल पर दवाई रो कंटेंट ढूंढ-ढूंढ के वणपे पूरा भरोसो। म्हारा बाप-दादा तो डॉक्टर साब री बात ने आखरी बात मानता। आधी बीमारी तो भरोसा में ज भाग जाती। याज बात कानून मे बी है। वकील घंटा भर समझावै, पण समझ मे नी आवै। फेर गूगल खोले ने जद समझ आवे। पण बाद मे पतो चाले के कोरट मे काम तो वकील ई आवे, गूगल नी। बालपण ती जवानी तक जिणे पढ़ायो, लिखायो, संस्कार दिदा,उ गुरुजी पर भरोसो नी। पण उ सड़ा टूल पे भरोसो खूब। यो भूल जावै है कि मास्टर साब किताबी ज्ञान का अलावा बी जिनगी जीणो, लोगां ती बोलचाल करनो ने व्यवहार रो ज्ञान बी दियो। घर मे मां, दादी ने बुजुर्ग बाई केवे के आ, रसोई का माय हाथ बंटा, काम सीख... तो छोरियां तुरत ना कर दे। पण ई ज छोरियां गूगल ने यूट्यूब पे नई-नई रेसिपी ढूंढवा मे लागी रै। रेसिपी तो सीख ले, पण आटो कदी गूंथनो, भिंडी पोंछी ने कतरनी, दाल-चावल किस्तर धोवा, तड़को कद देनो... यो गूगल कई सिखावेगो? मां-दादी सामूं बेठी-बेठी हाथ पकड़ी के सिखावा तैयार है, पण आजकाल मशीन पे निर्भर रेनो ज आत्मनिर्भर होनो समझायो जावै। पेलां जमाना मे कदी कोई को घर बताणो होतो तो लैंडमार्क जबानी याद रैता। कोना पर फलाणी दुकान, फेर मंदिर, फेर मोटू बोर्ड, फेर ऊं बड़ो पीपल रो झाड़... ने मनक सीध्धो नीला दरवाजा वाला घर पहुंच जावै। झाड़ बी सालां-साल खड़ा रैता। आज जसो कोनी के आज झाड़ दिख्यो, काल गायब। पण आज तो लोकेशन बिना कई नी होय। अजीब बात है, पण साची है। म्हें तो पूछतां-पूछतां लंका तक पहुंच जाता, पण आज रो मनक,मनक ती पूछनो ज नी चावे। उका दिमाग मे ई बैठ ग्यो है के आदमी धोखो देगो, पण मशीन कदी नी। अब बापड़ी मशीन को दिल है? दिमाग है? चालाकी कई करे? दगाबाजी तो मनक री फितरत है। पण मजा री बात या हे के मशीन पे आंख मूंदी ने भरोसो करवा का चक्कर मे मनक नरी दाण मशीन ती धोखो खई लेवै। अब देखो नी, एक दन अस्पताल मे चिट्ठी बनावा वास्ते लेन मे खड़ी थी। रिसेप्शन वाली बाई बोली-कैश कि फोन-पे? म्हें कई कैश। बस फेर कई, ऐसो देख्यो जणो कोई जमानो ती पिछड़ेली हूं ,ने लंबी लाइन मे भेज दी। बाजू वाली लेन मे फोन ती पैसा भरवा वाला मनक था, तो वा लेन छोटी दिखती थी। एक बार तो लाग्यो कि अपनै नीचो देखवायो जावै है। पण करूं कांई? ऑनलाइन भरपाई री आदत नी। मन मार के कैश वाली लेन मं खड़ी रई। फेर मजो आयो। म्हारी लंबी लेन तो झटपट चालती गई ने बाजू वाली ऑनलाइन वाली लेन जां री तां उभी ई रई। म्हें काउंटर तक पहुंच गई, पण बाजू वाला अंकल साब तो हाबला गाबला वई रिया था। काउंटर वालो ने अंकल साब घणी देर ती मोबाइल मं माथापच्ची करता रिया, पण स्कैन कई नी चाल्यो। आखिर मं काउंटर वालो बोल्यो- कैश दे दो दें तो। अब अंकल साब घबरई ग्या। खीसा मं कित्ता रुपिया है, ऊको अंदाजो तो रेतो। फेर बी घरवाली ने आवाज़ दी-ए सुन, जितरा पैसा होय,दे म्हारे।बापड़ी बाई पास छोटा-छोटा नोट मिलई के पांच-सौ, छः-सौ रुपया ज निकल्या। जमा तो बारह सौ करणा था। अब करो कई? गड़बड़ गूगल री थी के मशीन री, पण दगो तो मशीन ई दिदो। म्हूं कई अंकल साब, पैसा म्हारा ती
ले लो, बाद मं दे दियो।

बापड़ो घणो लजाय ग्यो। चेहरो लाल चट पड़ ग्यो। मशीन पे भरोसो करनो गुस्सो बी थो ने मजबूरी बी।वणीने म्हारा ती रुपिया लिदा, बार-बार धन्यवाद किदो ने पूछवा लाग्या- म्हूं तमारे ऑनलाइन भेज दूं? म्हें कई- अरे ई बात पाछे करां, पेलां तमारो काम तो पूरा करो।अबे कई कूं... मनक कोनी, मशीन दगो दई गी। फेर मने वाज गाणो याद आयो-दगाबाज रे... हाय दगाबाज रे... पण दगाबाजी तो हाल बाकी थी,ने ई वाली तो घणी डरावनी थी। भगवान कोई मनक ने असी दगाबाजी मशीन ती दूर राखे । चार जवान छोरा कार मं गूगल मैप देखतां-देखतां अपनो रस्तो पकड़्या जई रिया था। पूरी नई पीढ़ी, पूरा भरोसो गूगल पर। पण गूगल महाराज ने ई खबर ज नी कि आग्गे रो पुल टूट्यो हे। अगर गांव मं काईं सयाना आदमी ती एक दाण रस्तो पूछ लेता, गांव वालां ने गामठा समझी ने नजरअंदाज नी किदो होतो, तो चारां री जिनगी
[8/12/2026 2:01 PM] P Sikandar Parikh Parikh Sir: इस्तर खतम नी होती। मशीन पे भरोसो घणो महंगो पड़ ग्यो। ने अब तो ई मशीनां रा फेरा मं कई लोगां रा खाता तक साफ वई ग्या। पुराणा लोगां री एक बात आज बी याद आवै- म्हारा जमाना मं तो भरोसो ऐसो होतो कि गांव मं एक आदमी ने जरा तकलीफ होय, तो पूरा गांव उबो हो जावै। बस, ई भरोसो आदमी पे होतो, मशीन पे नी।

तो म्हारो तो आखिर मं ई मानणो हे के हाड़-मांस रो जीतो-जागतो मनक इतरो दगाबाज नी, जतरी दगाबाज आज री मशीन निकली।



ज्योति जैन

Updated on:
13 Aug 2026 06:01 am
Published on:
13 Aug 2026 06:01 am