
जयपुर। प्यार और दोस्ती की तलाश में डेटिंग ऐप्स का सहारा ले रहे किशोर और युवा अब डिजिटल जाल में फंसते जा रहे हैं। कारण कि, एक ओर पेड फीचर, प्रीमियम सदस्यता और ऑनलाइन गिफ्ट के नाम पर उनकी जेब खाली हो रही है। वहीं दूसरी ओर बढ़ती लत उन्हें मानसिक तनाव, अकेलेपन, पढ़ाई में गिरावट और सामाजिक अलगाव की ओर धकेल रही है। ऐसे मामले अब राजधानी जयपुर के मनोरोग विशेषज्ञों तक भी पहुंचने लगे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल ऐसे मामलों की संख्या बहुत अधिक नहीं है, लेकिन यदि समय रहते जागरूकता नहीं बढ़ी तो समस्या और गंभीर हो सकती है।
दरअसल, डेटिंग ऐप्स का उपयोग अब केवल वयस्कों तक सीमित नहीं रह गया है। सोशल मीडिया पर लगातार दिखाई देने वाले विज्ञापन, इन्फ्लुएंसर प्रमोशन और एल्गोरिदम आधारित सुझाव किशोरों और युवाओं को तेजी से इन प्लेटफॉर्म की ओर आकर्षित कर रहे हैं। धीरे-धीरे कई यूजर प्रीमियम सदस्यता, ऑडियो कॉल, वीडियो कॉल जैसे पेड फीचर्स पर लगातार खर्च करने लगे हैं।
17 वर्षीय मनोज (काल्पनिक नाम) घंटों मोबाइल पर डेटिंग ऐप पर चैट करता रहता था। वह आए दिन किसी न किसी बहाने से पैसे मांगने लगा और मना करने पर चिड़चिड़ा व गुस्सैल हो जाता था। उसकी पढ़ाई प्रभावित होने लगी और हर समय मोबाइल के नोटिफिकेशन पर नजर रहती थी। परिजन उसे काउंसलिंग के लिए मनोरोग विशेषज्ञ के पास लेकर पहुंचे, तब पता चला कि वह डेटिंग ऐप पर चैट के लिए भुगतान कर रहा था।
डेटिंग ऐप्स का संतुलित उपयोग और डिजिटल अनुशासन जरूरी है। यदि कोई किशोर या युवा घंटों इन ऐप्स पर समय बिताने लगे, बिना जरूरत पैसे खर्च करे, पढ़ाई प्रभावित होने लगे, परिवार और दोस्तों से दूरी बनाने लगे या ऐप का उपयोग नहीं करने पर बेचैनी महसूस करे, तो इसे गंभीरता से लेना चाहिए। ऐसे मामलों में परिवार को बच्चों से खुलकर संवाद करना चाहिए और जरूरत पड़ने पर मनोचिकित्सक या मनोवैज्ञानिक से सलाह लेनी चाहिए। खासकर किशोरों को ऐसे ऐप्स से दूर रखने की कोशिश करनी चाहिए। उनके मोबाइल में ऐप्स की भी जानकारी रखें।
-डॉ. संजय जैन, मनोरोग विशेषज्ञ
बातचीत भी महंगी, मिनटों में खाली हो रही जेब: कई ऐप्स पर ऑडियो कॉल के लिए प्रति मिनट 2 से 10 रुपए तक शुल्क लिया जाता है। यूजर्स को आकर्षित करने के लिए प्रोफाइल, तस्वीरें, तुरंत जवाब और खुलकर बातचीत जैसे कई प्रलोभन भी दिए जाते हैं।
पढ़ाई और नींद पर असर: मनोचिकित्सकों के अनुसार लगातार 'स्वाइप' करना, नए मैच मिलने की उम्मीद और बार-बार नोटिफिकेशन देखने की आदत कई किशोरों और युवाओं में डिजिटल निर्भरता बढ़ा रही है। नींद व काम पर भी असर पड़ता है।