जयपुर

जेएलएफ में नोबेल विजेता कैलाश सत्यार्थी की आत्मकथा ‘दियासलाई’ का लोकार्पण

Jaipur Literature Festival 2025: यह आत्मकथा उनकी जीवन यात्रा, संघर्ष और बच्चों को शोषण से मुक्त कराने के उनके अभियान की प्रेरक कहानी बयां करती है।

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Jan 31, 2025

जयपुर। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल (जेएलएफ) के मंच पर नोबेल शांति पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी की आत्मकथा ‘दियासलाई’ का लोकार्पण हुआ। यह आत्मकथा उनकी जीवन यात्रा, संघर्ष और बच्चों को शोषण से मुक्त कराने के उनके अभियान की प्रेरक कहानी बयां करती है।

खास बात यह रही कि पुस्तक का विमोचन छह युवाओं ने किया, त्यार्थी के अभियान ने बाल श्रम से मुक्त कराया था। पुस्तक में सत्यार्थी लिखते हैं, अंधेरे का अंत हमेशा किसी छोटी सी चिंगारी से होता है। जैसे माचिस की एक तीली सदियों के घने अंधेरे को चीरकर रोशनी फैला सकती है, वैसे ही हर व्यक्ति के भीतर दुनिया को बेहतर बनाने की अपार संभावनाएं छुपी होती हैं। जरूरत है उन्हें पहचानने और रोशन करने की। सत्यार्थी ने अपनी 17 साल की आयु लिखी कवित भी सुनाई, जो उनके संघर्ष के चुनाव और लक्ष्य को दिखाती है।

शर्मा से बनें ‘सत्यार्थी’

मध्य प्रदेश के निवासी कैलाश सत्यार्थी बचपन से ही राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से प्रेरित रहे थे। एक ब्राह्मण परिवार में रहते हुए उन्होंने अपना नाम कैलाश शर्मा से सत्यार्थी के रूप में बदला। इसके पीछे 15-16 साल की उम्र के एक किस्से का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि उनके गांव में ज्यादातर लोग गांधी के विचारों से प्रेरित थे।

ऐसे में उन्होंने 2 अक्टूबर वाले दिन अछूत कहलाने वाली जातियों की महिलाओं को खाना बनाकर गांधी के विचारों से प्रेरित लोगों को खाना खिलाने के लिए कहा। लेकिन एक भी व्य​क्ति इसमें शामिल नहीं हुआ। उनकी इस पहल का विरोध समाज के साथ-साथ परिवार में भी हुआ और परिजनों ने काफी विरोध जताया।

यहां तक कि शुद्धिकरण के लिए 101 ब्राह्मण के पैर धोने के साथ-साथ उन्हें प्रयागराज संगम पर जाकर स्नान करने की भी सलाह दी गई। इस घटना से आहत होकर कैलाश सत्यार्थी ने सत्य के रास्ते पर चलते हुए अपने सरनेम को शर्मा से बदल दिया।

राष्ट्रपति को सौंप दिया नोबेल

उन्होंने बताया, जब नोबेल पुरस्कार की घोषणा के बाद उन्हें तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. प्रणब मुखर्जी से मिलने का मौका मिला, तो उन्हें कहा गया कि रविंद्र नाथ टैगोर को मिला नोबेल पुरस्कार चोरी होने के बाद भारत वर्ष में किसी भी मूल भारतीय को नोबेल पुरस्कार नहीं मिला था।

अगर भी इस पुरस्कार को अपने पास रखते, तो वह उनके परिवार की निजी संपत्ति हो जाता, लेकिन अब यह पुरस्कार राष्ट्र की संपत्ति है जो बाकी लोगों को भी प्रेरणा देगा कि वह बाल श्रम के खिलाफ काम करने के लिए आगे आएं और राष्ट्र का गौरव बनें।

खींची खुद की तस्वीर

कैलाश सत्यार्थी ने बताया कि वे हमेशा नोबेल पुरस्कार विजेता के साथ अपनी तस्वीर खिंचवाने की तमन्ना रखते थे। वह एकदफा दलाई लामा से भी मिले, लेकिन तब भी उन्हें इसका मौका नहीं मिल पाया। लिहाजा, जब नोबेल पुरस्कार की घोषणा हुई, तो एक पत्रकार के जरिए उन्हें इसकी जानकारी मिली।

इस दौरान उनके कई साथियों ने आकर उन्हें बधाई दी। इसके बाद कैलाश सत्यार्थी बाथरूम में गए और आईने के सामने खुद के मोबाइल से दनादन तस्वीरों को खींच लिया। इस तरह से उन्होंने बताया कि कैसे कैलाश सत्यार्थी ने नोबेल पुरस्कार विजेता के साथ खुद की तस्वीर खिंचवाने की ख्वाहिश को पूरा किया।

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