जयपुर

Padma Awards 2026 : राजस्थान के गफरुद्दीन मेवाती की दीवानगी का आलम, लोग बदल देते थे ब्याह की तारीख, अब मिलेगा पद्म पुरस्कार

Padma Awards 2026: देश के पद्म पुरस्कारों की सूची में इस बार राजस्थान के डीग जिले के मेवात अंचल का नाम चमका है। कामां विधानसभा क्षेत्र के गांव कैथवाड़ा निवासी अंतरराष्ट्रीय भपंग वादक और पांडुन का कड़ा’ (मेवाती भाषा में महाभारत गायन) के साधक 62 वर्षीय गफरुद्दीन मेवाती जोगी को पद्म श्री से नवाजा जाएगा।

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Jan 25, 2026
padma shri gafruddin mewati: फोटो पत्रिका नेटवर्क

भरतपुर। गांव की चौपाल से लेकर लंदन और पेरिस के मंच तक जिस कला ने सफर तय किया, उसी कला के साधक को अब देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान मिला है। मेवात की विलुप्त प्राय: लोक परंपरा ‘भपंग’ और ‘पांडुन का कड़ा’ को जीवन समर्पित करने वाले गफरुद्दीन मेवाती को पद्म पुरस्कार देकर भारत सरकार ने लोक कलाकारों की तपस्या को राष्ट्रीय पहचान दी है। यह सम्मान महज एक कलाकार का नहीं, बल्कि राजस्थान की मिट्टी से जन्मी उस संस्कृति का है, जो पीढ़ियों से लोककंठ में बहती रही है।

देश के पद्म पुरस्कारों की सूची में इस बार राजस्थान के डीग जिले के मेवात अंचल का नाम चमका है। कामां विधानसभा क्षेत्र के गांव कैथवाड़ा निवासी अंतरराष्ट्रीय भपंग वादक और पांडुन का कड़ा’ (मेवाती भाषा में महाभारत गायन) के साधक 62 वर्षीय गफरुद्दीन मेवाती जोगी को पद्म श्री से नवाजा जाएगा।

गफरुद्दीन उन चुनिंदा कलाकारों में हैं, जिन्होंने छह दशक से अधिक समय तक एक विलुप्तप्राय लोककला को जीवित रखा और उसे वैश्विक पहचान दिलाई। गफरुद्दीन मेवाती ‘पांडुन का कड़ा’ के एकमात्र जीवित विशेषज्ञ माने जाते हैं। वे करीब ढाई हजार से अधिक दोहे कंठस्थ रखने वाले कलाकार हैं। उनकी भपंग के साथ महाभारत, महादेव का ब्यावला, ब्रज लोकगीत और श्रीकृष्ण भजन की प्रस्तुति श्रोताओं को लोक और आस्था की दुनिया में ले जाती है। फाल्गुन की बयार में उनके होली गीत आज भी गांव-ढाणियों से लेकर बड़े मंचों तक गूंजते हैं।

सात समंदर पार भी हैं कद्रदान

सात समंदर पार भी उनके हुनर के कद्रदान हैं। गफरुद्दीन लंदन, पेरिस, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, फ्रांस और अमेरिका सहित कई देशों में अपनी कला का प्रदर्शन कर चुके हैं। वे बताते हैं कि इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ के जन्मदिन पर भपंग की प्रस्तुति देना उनके जीवन का सबसे यादगार क्षण रहा। यह साबित करता है कि लोककला सीमाओं में नहीं बंधती, यदि उसमें आत्मा हो।

विरासत में मिली कला

गफरुद्दीन को कला विरासत में मिली। पिता बुद्ध सिंह जोगी इस विधा के बड़े साधक थे और उन्हीं से गफरुद्दीन ने भपंग और ‘पांडुन का कड़ा’ की बारीकियां सीखीं। आज वे इस विरासत को आगे बढ़ाने में जुटे हैं। वे अपने बेटे शाहरुख और पोतों दानिश जोगी और वंदिल जोगी को भी इस कला का प्रशिक्षण दे रहे हैं, ताकि आने वाली पीढ़ी तक यह परंपरा जिंदा रहे। गफरुद्दीन इससे पहले भी राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय सम्मानों से नवाजे जा चुके हैं। महात्मा गांधी की 150वीं जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में उन्हें प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से आमंत्रित कर सम्मानित किया गया था, जहां देश-विदेश की नामी हस्तियां मौजूद थीं। राज्य सरकार भी उन्हें उनके योगदान के लिए सम्मानित कर चुकी है।

बदल जाती थीं शादियों की तारीख

गफरुद्दीन बताते हैं कि पहले समय में उनकी कला का स्थानीय स्तर पर बड़ा सम्मान था। गांवों में शादी-ब्याह तय होते समय लोग उनकी उपलब्धता पूछते थे। यदि उस तारीख को वे कहीं और बुक होते थे तो परिवार शादी की तारीख तक बदल देते थे। आज तकनीक के दौर में युवा पीढ़ी सोशल मीडिया में व्यस्त है, लेकिन लोककला की जड़ें अब भी गांव की मिट्टी में हैं। मेवाती जोगी संस्कृति हिंदू और मुस्लिम परंपराओं का अनोखा संगम है।

मेवात में खुले कला संरक्षण को इंस्टीट्यूट

भपंग वादक गफरुद्दीन मेवाती ने कहा कि राज्य सरकार को चाहिए कि एक ऐसा इंस्टीट्यूट खोला जाए, इससे लुप्त हो रही इस प्राचीन कला का संरक्षण हो सके। हालांकि 25-30 युवाओं को इस कला में निपुण किया है, जो कि देश-विदेश में इस कला का उजाला फैला रहे हैं। लेकिन वर्तमान सोशल मीडिया के दौर में सरकार के प्रयास आवश्यक हैं।

Updated on:
25 Jan 2026 06:39 pm
Published on:
25 Jan 2026 06:38 pm
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