
डिग्री के साथ बच्चों को विनय, क्षमा, सेवा और सत्य के संस्कार दें,
दीक्षार्थियों की हुई गोद भराई
देवली.मुनि सुप्रभ सागर महाराज ने कहा कि धर्म में क्रिया के साथ भावना का होना सबसे जरूरी है। अभिषेक विधान पर प्रवचन करते हुए उन्होंने कहा कि कोई भी मंगल कार्य निर्विघ्न संपन्न हो, इसके लिए सबसे पहले मंगलाचरण किया जाता है। उन्होंने कहा कि हमारे पास आने वाला जल पहले से शुद्ध होता है, लेकिन उसे तीर्थ जल बनाने के लिए मंत्रोच्चार के साथ जलधारा छोड़ी जाती है।
महाराज ने कहा कि देवलोक में भगवान का अभिषेक क्षीर सागर के ऐसे जल से होता है, जिसमें जीव नहीं होते, इसलिए उसे छानने की आवश्यकता नहीं होती। वहीं मनुष्य लोक में जीव रक्षा की भावना से जल को कपड़े से छानकर पीने की परंपरा है। उन्होंने कहा कि विज्ञान के अनुसार एक बूंद अनछने पानी में हजारों सूक्ष्म जीव हो सकते हैं, जबकि तीर्थंकर भगवान ने एक बूंद में असंख्यात जीव बताए हैं। इसलिए जीव रक्षा के लिए पानी छानकर पीना आवश्यक है।
डिग्री के साथ संस्कार भी जरूरी
युवाओं को संबोधित करते हुए मुनि सुप्रभ सागर महाराज ने कहा कि डिग्री से जीवन सफल नहीं बनता। बच्चों को शिक्षा के साथ विनय, क्षमा, सेवा और सत्य के संस्कार भी दिए जाने चाहिए। संस्कारों से ही बच्चा आगे चलकर परिवार और समाज का नाम रोशन करता है।
दीक्षा का सार राग-द्वेष का त्याग
वहीं वैराग्य सागर महाराज ने गुंसी में विज्ञाश्री माताजी के सान्निध्य में 23 अगस्त को होने वाली जैनेश्वरी दीक्षा के लिए शहर आईं दीक्षार्थी दीदियों को संबोधित किया। इस अवसर पर समाज के लोगों ने दीक्षार्थी दीदियों की गोद भराई कर अनुमोदना की।
देवली. जैनेश्वरी दीक्षा से पूर्व मुनि संघ का आशीर्वाद लेने और गोद भराई के लिए पहुंचीं दीक्षार्थी दीदियां।