राजस्थान की राजनीति में उस समय हड़कंप मच गया जब भजनलाल सरकार को किसी और ने नहीं, बल्कि उनकी अपनी ही पार्टी के विधायकों ने घेर लिया। विपक्ष से ज्यादा भाजपा के ही सदस्य इस मुद्दे पर आक्रामक नजर आए, जिससे ये चर्चा तेज हो गई है कि क्या राजस्थान में सरकार अपनों के ही निशाने पर है?
जयपुर। राजस्थान विधानसभा का बजट सत्र इन दिनों काफी गरमाया हुआ है। शुक्रवार को सदन की कार्यवाही के दौरान एक अजीब नजारा देखने को मिला, जब भाजपा के ही विधायकों ने अपनी सरकार के उच्च शिक्षा मंत्री प्रेमचंद बैरवा को कटघरे में खड़ा कर दिया। मामला निजी विश्वविद्यालयों द्वारा बांटी जा रही फर्जी डिग्रियों और नियामक आयोग (Regulatory Commission) के गठन में हो रही देरी से जुड़ा था।
सदन में प्रश्नकाल के दौरान जब निजी विश्वविद्यालयों की अनियमितताओं का मुद्दा उठा, तो सत्तापक्ष के कई विधायकों ने मंत्री को घेरते हुए कहा कि सरकार को आए दो साल होने को हैं, लेकिन अब तक जमीनी स्तर पर कोई प्रभावी बदलाव नहीं दिखा है। विधायकों का आरोप था कि निजी विश्वविद्यालय नियमों को ताक पर रखकर डिग्रियां बेच रहे हैं और विभाग केवल नोटिस-नोटिस खेल रहा है।
उच्च शिक्षा मंत्री प्रेमचंद बैरवा ने सदस्यों के गुस्से को शांत करने की कोशिश करते हुए कहा कि सरकार हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठी है। उन्होंने देरी की मुख्य वजह बताते हुए कहा:
मंत्री ने सदन में उन 10 विश्वविद्यालयों के नाम उजागर किए जिनके खिलाफ अनियमितताओं, फर्जीवाड़े और नियमों के उल्लंघन के मामले में कड़ी कार्रवाई शुरू की गई है:
यह केवल प्रशासनिक कार्रवाई तक सीमित नहीं है। फर्जी डिग्री और गलत तरीके से मान्यता हासिल करने के मामले में एसओजी (SOG) ने भी शिकंजा कसा है।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि भजनलाल सरकार के लिए यह स्थिति असहज है। जब सत्तापक्ष के विधायक (जैसे कालीचरण सराफ आदि) ही सदन में मंत्री को घेरते हैं, तो इससे यह संदेश जाता है कि नौकरशाही और सरकार के बीच तालमेल की कमी है। विधायकों का मुख्य गुस्सा इस बात पर है कि पूर्ववर्ती सरकार के समय शुरू हुए घोटाले अब भी जारी हैं और 'जीरो टॉलरेंस' का नारा केवल कागजों तक सीमित नजर आ रहा है।