
Rajasthan High Court : जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने एक शिक्षिका को पूरे 180 दिन का मातृत्व अवकाश देने के निर्देश दिए हैं। न्यायाधीश अनूप कुमार ढंड ने कहा कि मातृत्व अवकाश मां और बच्चे के बीच स्नेह व जुड़ाव स्थापित करने के लिए दिया जाता है। संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त जीवन के अधिकार में मातृत्व का अधिकार और प्रत्येक बच्चे के पूर्ण विकास का अधिकार भी शामिल है। अदालत ने शिक्षिका को नए स्कूल में कार्यग्रहण करने से पहले केवल 34 दिन का मातृत्व अवकाश मिलने के मामले में शेष अवधि सहित पूरे 180 दिन का अवकाश, पूर्ण वेतन और सेवा संबंधी लाभ देने के आदेश दिए। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि मातृत्व अवकाश की इस अवधि को सेवा में व्यवधान नहीं माना जाएगा।
याचिकाकर्ता पूजा यादव ग्रेड-III, लेवल-I के पद पर महात्मा गांधी राजकीय विद्यालय (अंग्रेजी माध्यम), सिवाना, बाड़मेर में कार्यरत थीं। गर्भावस्था के दौरान उन्होंने 1 सितंबर 2023 से 4 अक्टूबर 2023 तक 34 दिन के मातृत्व अवकाश के लिए आवेदन किया था, जिसे सक्षम अधिकारियों ने स्वीकृत कर लिया था।
इसी दौरान 27 सितंबर 2023 को उन्होंने बच्चे को जन्म दिया। इसके बाद याचिकाकर्ता का चयन महात्मा गांधी राजकीय अंग्रेजी माध्यम विद्यालय, पुर, ब्लॉक कोटपूतली-बहरोड़ (तत्कालीन जिला खैरथल-तिजारा) में हो गया। उन्होंने 6 अक्टूबर 2023 को नए विद्यालय में कार्यग्रहण कर लिया। नए स्कूल में ज्वाइन करने के बाद उन्होंने अधिकारियों से अनुरोध किया कि 1 सितंबर 2023 से शुरू होने वाले कुल 180 दिन के मातृत्व अवकाश का लाभ उन्हें लगातार दिया जाए, लेकिन उनके अनुरोध पर ध्यान नहीं दिया गया। नवजात बच्चे की उचित देखभाल और पालन-पोषण की जरूरत के चलते शिक्षिका को बाल देखभाल अवकाश के लिए आवेदन करना पड़ा।
राजस्थान हाईकोर्ट ने फैसले में कहा कि मातृत्व अवकाश का उद्देश्य महिलाओं के लिए सामाजिक न्याय सुनिश्चित करना है। मातृत्व और बाल्यकाल, दोनों ऐसे चरण हैं जिन पर विशेष ध्यान दिए जाने की जरूरत होती है। यह अवकाश केवल स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के कारण नहीं दिया जाता, बल्कि मां और बच्चे के बीच स्नेह, जुड़ाव और भावनात्मक संबंध विकसित करने में भी इसकी अहम भूमिका है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने राजस्थान सेवा नियमों के नियम-103 का उल्लेख करते हुए कहा कि इसके तहत दो से कम जीवित संतान वाली महिला सरकारी कर्मचारी को मातृत्व अवकाश देने का प्रावधान है।
एक अन्य फैसले में राजस्थान हाईकोर्ट ने सूचना सहायक भर्ती 2013 से जुड़ी राजाराम मीणा और पांच अन्य की ओर से दायर याचिका को स्वीकार करते हुए सरकार के 27 मई 2015 के विवादित आदेश को खारिज कर दिया। न्यायाधीश गणेश राम मीणा ने कहा कि कई वर्षों तक सफलतापूर्वक सरकारी सेवा देने वाले कर्मचारियों को अचानक नौकरी से बाहर करना उनके जीवन को तबाह करने जैसा है, विशेषकर तब, जब वे दूसरी सरकारी नौकरियों के लिए निर्धारित आयु सीमा भी पार कर चुके हैं। कर्मचारियों का चयन और नियुक्ति दस्तावेजों के सत्यापन के बाद हुई थी, लेकिन बाद में सरकार ने एक आंतरिक जांच रिपोर्ट के आधार पर उनकी नियुक्तियां रद्द कर दीं। महत्वपूर्ण बात यह रही कि जिस जांच रिपोर्ट को कार्रवाई का आधार बनाया गया, उसकी प्रति याचिकाकर्ताओं को उपलब्ध नहीं कराई गई थी। हाईकोर्ट ने इस प्रक्रिया को प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध माना और आदेश दिया कि याचिकाकर्ताओं को उनकी प्रारंभिक नियुक्ति की तारीख से निरंतर सेवा में माना जाए।