दिनों दिन एआइ की भूमिका बढ़ रही है। ऐसे में इंसान को खुद को नए सिरे से तैयार करने की जरूरत आ पड़ी है। इन वक्ताओं ने कहा कि एआइ तेज़ी से दुनिया को बदल रहा है। तकनीकी और बौद्धिक कामों को अपने हाथ में ले रहा है, लेकिन इसके बावजूद इंसानी भावनाएं, रचनात्मकता और विवेक सबसे अहम रहेंगे।
जयपुर. जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल (JLF) में सत्र हृयूमन एज: व्हाट्स कुकिंग इन एआइ (Human Edge: What's Cooking in AI) पर चर्चा हुई। इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और इंसान के रिश्ते को लेकर गंभीर और रोचक तथ्य पैनल ने दर्शकों के सामने रखे। सत्र में अली इस्लामी, अभिषेक सिंह, नितिन सेठ और बरसाली भट्टाचार्य ने अपने अनुभवों को साझा किया। सभी एक बात पर सहमत नजर आए कि दिनों दिन एआइ की भूमिका बढ़ रही है।
ऐसे में इंसान को खुद को नए सिरे से तैयार करने की जरूरत आ पड़ी है। इन वक्ताओं ने कहा कि एआइ तेज़ी से दुनिया को बदल रहा है। तकनीकी और बौद्धिक कामों को अपने हाथ में ले रहा है, लेकिन इसके बावजूद इंसानी भावनाएं, रचनात्मकता और विवेक सबसे अहम रहेंगे। पैनल ने यह भी माना कि एआइ औसत काम कर सकता है, लेकिन असाधारण काम के लिए इंसानी सोच, अनुभव और भावनाएं जरूरी हैं। एआइ के युग में इंसान की हृूमन एज और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाएगी।
अली इस्लामी ने एआइ के तेज विकास पर आश्चर्य जताते हुए कहा कि यह तकनीक की खोज इंसानों ने ही की है। उन्होंने कहा कि आज मशीनें सीख रही हैं, फैसले ले रही हैं, लेकिन यह सब इंसानी दिमाग और संस्थाओं की देन है, इसलिए खुद इंसान को कम आंकना ठीक नहीं है।
नेवीगेटिंग एआइ इन द वर्ल्ड लार्जेस्ट डेमोक्रेसी का जिक्र करते हुए कहा कि एआइ सिर्फ टेक्नोलॉजी नहीं, बल्कि आम नागरिकों के जीवन से जुड़ा मुद्दा है। उन्होंने कहा कि एआइ से नौकरियों, शासन, सुरक्षा और मानवीय रिश्तों पर क्या असर पड़ेगा, इस पर सोचने और चर्चा करने की भी जरूरत है।
नितिन सेठ ने कहा कि आने वाले एक से डेढ़ दशक में बड़ी संख्या में नौकरियां प्रभावित होंगी। उन्होंने कहा कि एआइ इंसानों को खत्म नहीं करेगा, लेकिन इंसानों को खुद को नए सिरे से तैयार करना होगा। जोखिम लेने की क्षमता, उद्यमिता, कल्पनाशक्ति और संदर्भ को समझने की ताकत ही इंसान की असली पहचान बनेगी।