पर्युषण महापर्व के सातवें दिन अठ्ठाई तप पूर्ण करने वाले तपस्वियों का वधाकर जुलूस पटवा हवेली से महावीर भवन तक निकाला गया।
पर्युषण महापर्व के सातवें दिन अठ्ठाई तप पूर्ण करने वाले तपस्वियों का वधाकर जुलूस पटवा हवेली से महावीर भवन तक निकाला गया। साध्वी प्रशमिता, साध्वी अर्हमनिधि, साध्वी परमप्रिया और साध्वी अर्पणनिधि के सानिध्य में तथा सकल संघ के तत्वावधान में हुए इस आयोजन में सभी तपस्वियों को आठवें उपवास का सामूहिक प्रत्याख्यान करवाकर मंगलाचरण किया गया।साध्वी प्रशमिता और साध्वी अर्हमनिधि ने कल्पसूत्र ग्रंथ का वाचन करते हुए आदिनाथ भगवान ऋषभदेव के जीवन प्रसंगों का उल्लेख किया। बताया गया कि तीसरे आरे के अंत में मरूदेवी माता के गर्भ से युग्लिक रूप में जन्मे आदिनाथ के पिता कुलकर नाभिराज थे। तेरह भवों के वर्णन में यह उल्लेख है कि धन्नासार्थवाह के भव में उन्हें समयक्त्व प्राप्त हुआ और वे अवसर्पिणी काल के प्रथम राजा तथा प्रथम तीर्थंकर बने।
प्रवचन में कहा गया कि दीक्षा के पश्चात ऋषभदेव को मन:पर्यव ज्ञान की प्राप्ति हुई, किंतु पूर्व जन्म के कर्म के कारण 400 दिन तक आहार नहीं मिला। अंततः उनके पौत्र श्रेयांस कुमार ने इक्षुरस से उनका पारणा कराया। यह भी बताया गया कि उनके समवशरण में भरत चक्रवर्ती माता मरूदेवी को हाथी पर बिठाकर ले जा रहे थे, जहां ऋषभदेव की आभा देखकर मरूदेवी को वैराग्य उत्पन्न हुआ और वे अवसर्पिणी काल की प्रथम मोक्षगामी बनीं।साध्वी ने आगे महावीर स्वामी के बाद गणधर सुधर्मा स्वामी से लेकर वर्तमान गच्छाधिपति जिन मणिप्रभ सूरीश्वर महाराज तक की पट्ट परंपरा का विस्तृत वर्णन किया। प्रवक्ता पवन कोठारी ने बताया कि प्रवचन के पश्चात अठ्ठाई तपस्वियों की सांझी आयोजित हुई, जिसमें सकल जैन संघ ने सामूहिक गुरु वंदन कर मांगलिक श्रवण किया।