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आखिर खरीफ के सीजन में हर साल क्यों होती है यूरिया की मारामारी? कालाबाजारी या खाद की कमी?

Kharif Season Urea Demand : हर साल खरीफ सीजन से पहले देश में यूरिया की किल्लत क्यों हो जाती है? जानिए यूरिया संकट के पीछे का पूरा गणित, सब्सिडी का बजट, मिट्टी पर इसका प्रभाव और इसके प्रमुख विकल्प।
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Jul 22, 2026
Kharif Season Urea Demand
Kharif Season Urea Demand : खरीफ के सीजन में यूरिया की अधिक डिमांड क्यों रहती है? क्यों हो जाती है कमी, PC- Patrika

Kharif Season Urea Demand : देश में लगभग हर साल खरीफ सीजन शुरू होने से पहले यूरिया को लेकर चर्चा तेज हो जाती है। कई राज्यों में किसानों की लंबी कतारें दिखती हैं, कहीं आपूर्ति कम पड़ने की शिकायत आती है तो कहीं कालाबाजारी की खबरें सामने आती हैं। सवाल यह है कि आखिर यूरिया की कमी बार-बार क्यों होती है? क्या इसका कारण कच्चे माल की कमी है, उत्पादन की सीमाएं हैं या फिर किसानों की बढ़ती मांग? आइए इसे आसान भाषा में समझते हैं।

यूरिया क्या है और किसानों के लिए इतनी जरूरी क्यों?

यूरिया एक रासायनिक उर्वरक (Chemical Fertilizer) है जिसमें लगभग 46 प्रतिशत नाइट्रोजन होती है। नाइट्रोजन पौधों की बढ़वार, पत्तियों के विकास और हरियाली के लिए सबसे महत्वपूर्ण पोषक तत्वों में से एक है। धान, गेहूं, मक्का, गन्ना, कपास और अधिकांश फसलों में नाइट्रोजन की जरूरत होती है। इसलिए यूरिया भारतीय कृषि का सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला उर्वरक बन गया है।

खरीफ से पहले ही क्यों बढ़ जाती है यूरिया की मांग?

खरीफ सीजन में धान, मक्का, बाजरा, सोयाबीन, कपास जैसी फसलों की बुवाई होती है। मांग बढ़ने के प्रमुख कारण हैं- मानसून के साथ एक साथ बड़े क्षेत्र में बुवाई, धान जैसी फसलों में अधिक नाइट्रोजन की जरूरत, किसानों का शुरुआती चरण में ज्यादा यूरिया खरीदना, और भविष्य की कमी के डर से अतिरिक्त स्टॉक करना। यही कारण है कि जून से अगस्त के बीच यूरिया की मांग अचानक बढ़ जाती है।

आखिर यूरिया की कमी क्यों होती है?

  1. मांग और आपूर्ति में असंतुलन - भारत दुनिया के सबसे बड़े उर्वरक उपभोक्ता देशों में शामिल है। जब खरीफ या रबी सीजन शुरू होता है तो कुछ ही हफ्तों में मांग कई गुना बढ़ जाती है, जिससे उत्पादन और परिवहन व्यवस्था पर अचानक दबाव बढ़ जाता है।
  2. किसानों द्वारा जरूरत से ज्यादा खरीद - कई बार किसानों को आशंका रहती है कि आगे यूरिया नहीं मिलेगी, इस वजह से वे एक बार में अधिक मात्रा खरीद लेते हैं। इससे कुछ क्षेत्रों में कृत्रिम कमी पैदा हो जाती है।
  3. कालाबाजारी और डायवर्जन - यूरिया की कीमत बहुत कम होने के कारण कुछ जगहों पर इसका उपयोग कृषि के बजाय प्लाईवुड, नकली दूध बनाने जैसे गैर-कृषि कार्यों में करने की कोशिश होती है। नीम-कोटेड यूरिया अनिवार्य होने के बाद इसमें काफी कमी आई है, लेकिन समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं हुई। इसी दुरुपयोग पर लगाम कसने के लिए 2026 की शुरुआत में सरकार ने एक और कदम उठाया-यूरिया के मानक बैग का वजन 45 किलो से घटाकर 40 किलो कर दिया गया, ताकि गैर-कृषि उपयोग के लिए इसे बड़ी मात्रा में डायवर्ट करना मुश्किल हो।
  4. लॉजिस्टिक और वितरण की समस्या - कई बार देश में कुल यूरिया पर्याप्त होती है लेकिन सही समय पर सही जिले तक नहीं पहुंच पाती। रेल रैक, गोदाम, परिवहन और वितरण में देरी भी स्थानीय कमी की वजह बनती है।
  5. मौसम का प्रभाव - अगर मानसून समय से पहले या बेहतर रहता है तो बुवाई क्षेत्र बढ़ जाता है, और ऐसी स्थिति में यूरिया की मांग अनुमान से अधिक हो सकती है।

क्या कच्चा माल भी एक बड़ी वजह है?

हां, काफी हद तक। यूरिया उत्पादन के लिए मुख्य रूप से तीन चीजें जरूरी होती हैं- प्राकृतिक गैस (सबसे महत्वपूर्ण कच्चा माल और ऊर्जा स्रोत), प्राकृतिक गैस से बना अमोनिया, और अमोनिया व कार्बन डाइऑक्साइड के मेल से बनने वाली यूरिया। भारत अपनी जरूरत की प्राकृतिक गैस का बड़ा हिस्सा आयात करता है। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में गैस महंगी हो जाए या आपूर्ति प्रभावित हो जाए तो उत्पादन लागत बढ़ जाती है। पिछले कुछ वर्षों में कई बंद उर्वरक संयंत्रों को दोबारा शुरू किया गया है, फिर भी देश की कुल जरूरत का एक हिस्सा आयात से ही पूरा किया जाता है।

सरकार यूरिया पर कितनी सब्सिडी देती है?

यूरिया भारत का सबसे अधिक सब्सिडी वाला उर्वरक है। किसानों को अब 40 किलोग्राम का सल्फर-युक्त बैग करीब 254 रुपये में मिलता है, जबकि इसकी वास्तविक उत्पादन या आयात लागत इससे कई गुना अधिक होती है। बाकी राशि सरकार उर्वरक कंपनियों को सब्सिडी के रूप में देती है। कई जगह उपलब्ध जानकारी के अनुसार एक यूरिया के बैग पर लगभग 2000 से 4000 रुपए की सब्सिडी रहती है।

हर वर्ष केंद्र सरकार उर्वरक सब्सिडी पर हजारों करोड़ रुपये खर्च करती है, और कई वर्षों में यह राशि 1 लाख करोड़ रुपये से भी अधिक रही है। वित्त वर्ष 2026-27 के लिए अकेले यूरिया सब्सिडी का बजट लगभग 1.17 लाख करोड़ रुपये रखा गया है, और अंतरराष्ट्रीय बाजार में उथल-पुथल के चलते कुल उर्वरक सब्सिडी का बोझ इससे भी काफी ऊपर जा सकता है। यही वजह है कि यूरिया किसानों के लिए सबसे सस्ता नाइट्रोजन स्रोत बना हुआ है।

यूरिया की मांग सबसे ज्यादा क्यों रहती है?

सब्सिडी के कारण यह अन्य नाइट्रोजन स्रोतों से काफी सस्ती पड़ती है, देश के लगभग हर जिले में उपलब्ध है, दशकों से किसानों की आदत में शामिल है, फसल में हरियाली और बढ़वार जल्दी दिखा देती है, और कई क्षेत्रों में अभी भी संतुलित पोषण के बजाय नाइट्रोजन आधारित खेती ही ज्यादा प्रचलित है।

किसान यूरिया को ही क्यों प्राथमिकता देते हैं?

यूरिया डालने के कुछ दिनों बाद फसल अधिक हरी दिखाई देती है, और कई किसान इसी दृश्य प्रभाव को अच्छी पैदावार का संकेत मान लेते हैं। इसके अलावा डीएपी, एनपीके या अन्य उर्वरकों की तुलना में यूरिया का प्रति बैग खर्च काफी कम पड़ता है, और किसान इसके इस्तेमाल की मात्रा व तरीका पहले से जानते हैं, इसलिए इसे अपनाना आसान लगता है।

क्या ज्यादा यूरिया नुकसान भी करती है?

हां। अत्यधिक यूरिया उपयोग से मिट्टी का संतुलन बिगड़ता है, सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी होती है, भूजल प्रदूषण बढ़ सकता है, फसल गिरने (Lodging) का खतरा बढ़ता है, उत्पादन लागत बढ़ सकती है, और मिट्टी की जैविक गुणवत्ता कमजोर होती है।

किसानों के लिए यूरिया के विकल्प क्या हैं?

नैनो यूरिया - तरल रूप में, बहुत कम मात्रा में नाइट्रोजन उपलब्ध कराने वाला विकल्प, जिसे पत्तियों पर स्प्रे किया जाता है। इसे लेकर तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है: सरकार और ICAR के परीक्षणों में दावा किया गया है कि सही तरीके से (बेसल डोज़ के साथ) इस्तेमाल करने पर पैदावार प्रभावित नहीं होती और रासायनिक यूरिया की जरूरत 25-50% तक घट सकती है।

वहीं पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के स्वतंत्र अध्ययनों में गेहूं की पैदावार में करीब 21.6% और चावल में 13% तक की कमी तथा अनाज में प्रोटीन घटने की बात सामने आई है। साथ ही नैनो यूरिया की लागत दानेदार यूरिया से करीब 10 गुना ज्यादा है। यानी यह अभी भी वैज्ञानिक बहस का विषय है, न कि कोई तय समाधान।

गोबर की खाद - मिट्टी की संरचना सुधारती है और धीरे-धीरे पोषक तत्व उपलब्ध कराती है।
वर्मी कम्पोस्ट - केंचुओं द्वारा तैयार जैविक खाद, जो मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में मददगार है।
हरी खाद (Green Manure) - ढैंचा, सनई जैसी फसलें खेत में मिलाकर प्राकृतिक नाइट्रोजन उपलब्ध कराई जाती है।
जैव उर्वरक (Biofertilizers) - अजोला, एजोटोबैक्टर, राइजोबियम जैसे सूक्ष्मजीव आधारित विकल्प।
फसल अवशेष प्रबंधन - पराली और फसल अवशेषों को मिट्टी में मिलाने से प्राकृतिक पोषण बढ़ता है।
दलहनी फसलें - अरहर, मूंग, उड़द, चना जैसी फसलें वायुमंडलीय नाइट्रोजन को मिट्टी में स्थिर करने में मदद करती हैं।

क्या यूरिया का विकल्प पूरी तरह संभव है?

विशेषज्ञों के अनुसार अभी यूरिया को पूरी तरह हटाना व्यावहारिक नहीं है, क्योंकि भारत की खाद्य सुरक्षा बड़े पैमाने पर नाइट्रोजन उर्वरकों पर निर्भर है। लेकिन संतुलित पोषण, सावधानी से परखा गया नैनो यूरिया, जैविक खाद, हरी खाद और मिट्टी परीक्षण आधारित उर्वरक प्रबंधन के जरिए यूरिया पर निर्भरता धीरे-धीरे कम की जा सकती है।

Updated on:
22 Jul 2026 12:56 pm
Published on:
22 Jul 2026 12:56 pm