गुजरात के कच्छ में दशक बाद ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (गोडावण) के बच्चे का जन्म हुआ। ‘जंपस्टार्ट एप्रोच’ तकनीक और गुजरात-राजस्थान के संयुक्त प्रयासों से यह सफलता मिली। प्रोजेक्ट जीआईबी के तहत संरक्षण प्रयासों को नई उम्मीद मिली, जिससे इस विलुप्तप्राय प्रजाति के भविष्य को मजबूती मिली है।
वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में गुजरात ने एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है, जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। कच्छ जिले के अबडासा क्षेत्र में लगभग एक दशक बाद अत्यंत संकटग्रस्त पक्षी Great Indian Bustard (गोडावण/घोराड़) के एक बच्चे का सफलतापूर्वक जन्म हुआ है। यह घटना न केवल राज्य बल्कि पूरे देश के संरक्षण प्रयासों के लिए एक बड़ी उम्मीद के रूप में देखी जा रही है। राज्य के वन एवं पर्यावरण मंत्री Arjun Modhwadia ने इस सफलता को गुजरात के लिए गर्व का क्षण बताया। उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि कई संस्थाओं के संयुक्त और समन्वित प्रयासों का परिणाम है, जिनमें गुजरात और राजस्थान के वन विभाग, केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय और Wildlife Institute of India (डब्ल्यूआईआई) शामिल हैं।
इस परियोजना की खास बात यह रही कि इसमें ‘जंपस्टार्ट एप्रोच’ नामक एक आधुनिक और वैज्ञानिक तकनीक का उपयोग किया गया। यह तकनीक विशेष रूप से उन परिस्थितियों में कारगर साबित होती है, जहां प्राकृतिक प्रजनन में बाधाएं आती हैं। कच्छ क्षेत्र में लंबे समय से गोडावण की संख्या में गिरावट का एक प्रमुख कारण नर पक्षियों की कमी था, जिसके चलते मादा द्वारा दिए गए अंडे निष्फल रह जाते थे।
इस समस्या को दूर करने के लिए एक समाधान अपनाया गया। राजस्थान के ब्रीडिंग सेंटर से एक उपजाऊ (फर्टाइल) अंडा लिया गया और उसे अत्यंत सावधानी के साथ एक पोर्टेबल इन्क्यूबेटर में रखा गया। लगभग 19 घंटे की सतत यात्रा के बाद इस अंडे को सड़क मार्ग से सुरक्षित कच्छ पहुंचाया गया। 22 मार्च को इस अंडे को कच्छ में मौजूद मादा घोराड़ के घोंसले में स्थापित किया गया, जहां मादा ने स्वाभाविक रूप से उसे सेया। इसके परिणामस्वरूप 26 मार्च को एक स्वस्थ बच्चे का जन्म हुआ, जो इस प्रोजेक्ट की सफलता का प्रतीक है।
इस सफलता के पीछे लंबे समय से चल रहे संरक्षण प्रयास भी महत्वपूर्ण हैं। वर्ष 2011 में Narendra Modi, जो उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री थे, ने गोडावण के संरक्षण का विजन प्रस्तुत किया था। इसी दिशा में आगे बढ़ते हुए वर्ष 2016 में ‘प्रोजेक्ट जीआईबी’ की शुरुआत की गई। इस परियोजना के तहत राजस्थान के सम और रामदेवरा स्थित ब्रीडिंग सेंटरों में गोडावण की संख्या बढ़ाकर 73 तक पहुंचाई गई है। अब कच्छ में इस नई सफलता के साथ यह उम्मीद और मजबूत हो गई है कि भविष्य में इस विलुप्तप्राय प्रजाति को बचाने में और भी सकारात्मक परिणाम सामने आएंगे।