Supreme Court : सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा कि वकीलों पर सेवा में ‘खामी’ के लिए उपभोक्ता अदालत में केस नहीं चलाया जा सकता।
Supreme Court : सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा कि वकीलों पर सेवा में ‘खामी’ के लिए उपभोक्ता अदालत में केस नहीं चलाया जा सकता। वकील उपभोक्ता संरक्षण कानून के दायरे में नहीं आते। इसी के साथ शीर्ष कोर्ट ने कंज्यूमर कमीशन का 2007 का फैसला रद्द कर दिया, जिसमें कहा गया था कि उपभोक्ता के अधिकारों का ध्यान रखते हुए अगर वकील ठीक से सेवा नहीं देते हैं तो उन्हें उपभोक्ता अदालत में लाया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि इंडियन मेडिकल एसोसिएशन बनाम वी.पी. शांता मामले में उसके 1995 के फैसले पर भी पुनर्विचार की जरूरत है, जिसमें डॉक्टरों को उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत शामिल किया गया था।
सीजेआई से यह मामला बड़ी पीठ को सौंपने का अनुरोध किया गया है। जस्टिस बेला एम. त्रिवेदी और जस्टिस पंकज मित्तल की पीठ ने उस अपील पर फैसला सुनाया, जिसमें सवाल उठाया गया था कि क्या सेवाओं में कमी के लिए वकीलों को उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत उत्तरदायी ठहराया जा सकता है? सुनवाई के बाद पीठ ने 26 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। फैसले में पीठ ने कहा कि वकील जो सेवा देते हैं, वह अलग तरह की है। उपभोक्ता संरक्षण कानून से उन्हें बाहर रखा जाना चाहिए। कंज्यूमर कमीशन के 2007 के फैसले में कहा गया था कि वकीलों की सेवा भी सेक्शन 2 (1) ओ के तहत आती है, इसलिए उनके खिलाफ उपभोक्ता अदालत में मुकदमा चलाया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने अप्रेल 2009 में इस फैसले पर रोक लगा दी थी।
बार काउंसिल ऑफ इंडिया के डेटा के मुताबिक देश में करीब 13 लाख वकील हैं। वकीलों की कई संस्थाओं ने कंज्यूमर कमीशन के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दी थी। उनका कहना था कि अपना काम करने के लिए उन्हें सुरक्षा और स्वतंत्रता की जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स ऑन रिकॉड्र्स एसोसिएशन का कहना था कि कानूनी सेवा किसी वकील के नियंत्रण में नहीं होती। वकीलों को निर्धारित फ्रेमवर्क में काम करना होता है। फैसला भी वकीलों के अधीन नहीं होता। ऐसे में किसी केस के परिणाम के लिए वकीलों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
कोर्ट परिसर में मारपीट मामले में 10 वकीलों को अवमानना नोटिस
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रयागराज जिला अदालत परिसर में वादियों के साथ मारपीट के आरोपी दस वकीलों को आपराधिक अवमानना नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने उनके जिला जज अदालत परिसर में प्रवेश पर रोक भी लगा दी। जस्टिस अश्विनी कुमार मिश्रा और जस्टिस मोहम्मद अजहर हुसैन इदरिसी की खंडपीठ कहा, इस मामले में घटना को पूरी गंभीरता से देखा जाना चाहिए। किसी अदालत की कार्यवाही को इस तरह बाधित करने की इजाजत नहीं दी जा सकती कि वादियों को अदालत कक्ष में बेरहमी से पीटा जाए और पीठासीन अधिकारी को सुरक्षा के लिए अपने कक्ष में भागना पड़े। कोर्ट इस तरह की घटनाओं का मूक दर्शक नहीं बना रह सकता। पीठ ने कहा, बेईमान व्यक्तियों को स्पष्ट संदेश जाना चाहिए कि इस तरह की घटना से सख्ती से निपटा जाएगा।