
Women Reservation Bill : देश में एक बार फिर से महिला आरक्षण लागू करने और लोकसभा सीटों की बढ़ाने से जुड़े संवैधानिक संशोधन विधेयक को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। इसको लेकर केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को एक पत्र लिखा है। रिजिजू ने कहा कि सरकार ने विधेयक को पारित कराने के लिए विपक्ष के साथ संवाद और सहमति बनाने के लगातार प्रयास किए हैं। उन्होंने कहा कि अब इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर सभी राजनीतिक दलों से रचनात्मक सहयोग की अपेक्षा है।
इसके साथ ही केंद्रीय मंत्री रिजिजू ने उन आरोपों को भी खारिज किया है, जिसमें कहा गया कि मोद सरकार ने विपक्ष नजरअंदाज किया या आम सहमति बनाने की कोशिश नहीं की। उन्होंने बताया कि सरकार ने इस विधेयक को लेकर सभी पार्टियों से बातचीत की है।
दरअसल, 17 अप्रैल 2026 को लोकसभा में संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 पारित नहीं हो सका था। मतदान के दौरान विधेयक के पक्ष में 298 और विरोध में 230 वोट पड़े। इस विधेयक में लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या 850 करने और 2029 के आम चुनाव से पहले महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रस्ताव था।
बता दें कि संविधान संशोधन विधेयक पारित करने के लिए सदन में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है। मोदी सरकार विधेयक को लेकर सदन में दो-तिहाई बहुमत नहीं जुटा पाई थी। इसके बाद सरकार ने परिसीमन से जुड़ा एक अन्य विधेयक और केंद्र शासित प्रदेशों में संबंधित बदलावों के लिए लाया गया विधेयक भी वापस ले लिया।
गौरतलब है कि संसद ने 2023 में नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित किया था। इसके तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है। हालांकि, इसका क्रियान्वयन परिसीमन की प्रक्रिया पूरी होने से जुड़ा हुआ है।
सरकार के इस विधेयक पर कांग्रेस पार्टी का स्पष्ट रुख है कि महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों में से ही सीटें निर्धारित की जानी चाहिए। पार्टी नेता राहुल गांधी का कहना है कि संसद 2023 में ही महिला आरक्षण कानून पारित कर चुकी है, इसलिए इसे लागू करने में और देरी नहीं होनी चाहिए।
इसके अलावा कांग्रेस ने लोकसभा की मौजूदा सदस्य संख्या पर अगले 25 वर्षों तक रोक लगाने की मांग भी की है। पार्टी का तर्क है कि महिला आरक्षण लागू करने के लिए सीटों की संख्या बढ़ाना या परिसीमन को अनिवार्य शर्त बनाना जरूरी नहीं होना चाहिए।
लोकसभा में समाजवादी पार्टी के 37 सांसद है। सपा ने परिसीमन से जुड़े विधेयक का विरोध किया था। इस पर पार्टी का कहना है कि पर्याप्त जनसंख्या और जातिगत आंकड़ों के बिना निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण राजनीतिक प्रतिनिधित्व के संतुलन को प्रभावित कर सकता है। अखिलेश यादव सरकार के प्रस्ताव की जल्दबाजी पर भी सवाल उठा चुके हैं।
उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सपा के लिए भाजपा के इस प्रस्ताव का समर्थन करना आसान नहीं होगा।
संसद में अप्रैल में एमके स्टालिन की पार्टी डीएमके ने परिसीमन से जुड़े विधेयक का विरोध किया था। बता दें कि डीएमके के लोकसभा में 22 सांसद है। ऐसे में विधेयक पर डीएमके का रुख बहुत अहम माना जा रहा है।
तमिलनाडु विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के साथ डीएमके थी। दोनों पार्टियों ने तमिलनाडु में गठबंधन कर चुनाव लड़ा। लेकिन विधानसभा चुनाव में डीएमके को हार मिली और विजय की पार्टी टीवीके ने सबसे ज्यादा सीटें जीती। हालांकि टीवीके बहुमत हासिल नहीं कर पाई।
इसके बाद टीवीके को सरकार बनाने के लिए कांग्रेस ने साथ दिया। फिर डीएमके और कांग्रेस के बीच मतभेद सामने आ गए। विपक्ष के प्रदर्शनों में डीएमके ने दूरी बनाई हुई है।
ऐसे में अब दोनों गठबंधन डीएमके प्रमुख एम.के. स्टालिन के रुख पर नजर बनाए हुए हैं। भाजपा के रणनीतिकारों को उम्मीद है कि यदि डीएमके मतदान से दूर रहती है, तो इससे सरकार और विपक्ष के बीच मतों का अंतर कम हो सकता है।
तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने अप्रैल में विधेयक को गिराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। लेकिन पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में हार के बाद टीएमसी को संगठनात्मक और राजनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। दिए गए विवरण के मुताबिक, पार्टी के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 ने नेतृत्व के खिलाफ बगावत की और NCPI में शामिल हो गए।
इन बागी सांसदों ने सदन में एनडीए का साथ देने की बात कही है। हालांकि अब इन सांसदों के रुख पर भी सबकी नजर बनी हुई है कि परिसीमन से जुड़े विधेयक पर ये क्या फैसला लेते हैं?
वहीं ममता बनर्जी अब भी संवैधानिक संशोधन विधेयक का विरोध कर रही हैं और उन्होंने विपक्षी दलों से इसे हराने की अपील की है।
महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) भी विधेयक के विरोध में है। हालांकि, पार्टी की लोकसभा में ताकत पहले के मुकाबले कम हुई है।
एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में छह सांसदों के चले जाने के बाद उद्धव ठाकरे की पार्टी के पास लोकसभा में केवल तीन सांसद रह गए हैं। वहीं, शिंदे गुट के पास 13 सांसद हैं।
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) ने विधेयक को लेकर अपेक्षाकृत लचीला रुख दिखाया है। पार्टी ने संकेत दिया है कि यदि लोकसभा की सीटें बढ़ाई जाती हैं, तो सभी राज्यों में 50 प्रतिशत की समान वृद्धि पर विचार किया जाना चाहिए।
पार्टी को आशंका है कि केवल जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण उन राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को नुकसान पहुंचा सकता है, जिन्होंने जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने में बेहतर प्रदर्शन किया है। दक्षिण भारत के राज्यों को लेकर यह चिंता विशेष रूप से जताई गई है।
एनसीपी (एसपी) की नेता सुप्रिया सुले ने कहा है कि पार्टी अंतिम निर्णय लेने से पहले अपने विपक्षी सहयोगियों के साथ इस प्रस्ताव पर चर्चा करेगी।
वामपंथी दल भी संवैधानिक संशोधन विधेयक का विरोध कर रहे हैं। लोकसभा में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के दो, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) के चार और सीपीआई (माले) लिबरेशन के दो सांसद हैं। इस तरह इन दलों के कुल आठ सांसद हैं।
वामपंथी दल चाहते हैं कि लोकसभा की मौजूदा सदस्य संख्या पर लगी रोक जारी रहे। उनका रुख भी कांग्रेस की उस मांग के करीब है, जिसमें सीटें बढ़ाए बिना महिला आरक्षण लागू करने की बात कही गई है।
महिला आरक्षण को लेकर राजनीतिक सहमति बनाने की चुनौती अब भी केंद्र सरकार के सामने है। एक तरफ सरकार लोकसभा की सदस्य संख्या बढ़ाने और परिसीमन के जरिए आरक्षण लागू करने के पक्ष में है, तो दूसरी तरफ कई विपक्षी दल मौजूदा 543 सीटों के भीतर ही महिलाओं को आरक्षण देने की मांग कर रहे हैं।
दक्षिण भारतीय राज्यों में जनसंख्या नियंत्रण के आधार पर प्रतिनिधित्व प्रभावित होने की आशंका और जातिगत आंकड़ों की मांग भी इस विवाद के प्रमुख मुद्दे हैं। ऐसे में विधेयक पर आगे की राह विपक्षी दलों के रुख, सरकार की रणनीति और व्यापक राजनीतिक सहमति पर निर्भर करेगी।