
artists support Raihan Vadra: राजधानी दिल्ली के 'बीकानेर हाउस' में युवा कलाकार रेहान वाड्रा की सोलो आर्ट एग्जीबिशन से दिल्ली के हालिया विरोध प्रदर्शनों की तस्वीरें हटाए जाने का मामला अब सोशल मीडिया पर एक बड़ा आंदोलन बन गया है। इस सेंसरशिप के खिलाफ देश भर से तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। माइक्रोब्लॉगिंग प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर रेहान वाड्रा के समर्थन में बड़े राजनीतिक चेहरों और जाने-माने विचारकों की बाढ़ सी आ गई है। हर कोई इस प्रशासनिक कार्रवाई की निंदा करते हुए इसे लोकतंत्र और कला की आज़ादी पर सीधा हमला बता रहा है।
जैसे ही यह बात सामने आई कि बीकानेर हाउस प्रशासन के भारी दबाव और शाम 5 बजे के अल्टीमेटम के चलते रेहान को अपनी प्रदर्शनी 'नो आइडिया इज फाइनल' से दर्जनों तस्वीरें हटानी पड़ीं, सोशल मीडिया का पारा चढ़ गया। इस मुहिम में राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कहा कि दिल्ली के बीकानेर हाउस में रेहान वाड्रा की फोटो प्रदर्शनी से 70 से ज़्यादा तस्वीरें हटवा दी गईं। बीकानेर हाउस राजस्थान सरकार की संपत्ति है। यानी भाजपा सरकार की निगरानी में एक युवा कलाकार की कला का गला घोंटा गया, जो बेहद निंदनीय है।
वहीं, कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता और वरिष्ठ नेता पवन खेड़ा ने खुलकर अपनी बात रखते हुए प्रशासनिक दबाव पर कड़े सवाल खड़े किए। उनके साथ ही कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय मीडिया पैनलिस्ट सुरेन्द्र राजपूत और AICC की राष्ट्रीय सचिव रुचिरा चतुर्वेदी ने भी इस घटना की तीव्र निंदा करते हुए इसे सत्ताई डर का प्रतीक बताया है।
इन राजनीतिक चेहरों के अलावा, NSUI इंडिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष विनोद जाखड़ ने भी इस सेंसरशिप के खिलाफ जोरदार आवाज उठाई है और युवा कलाकारों की आज़ादी का समर्थन किया है। राजनीति से ऊपर उठकर कला और समाज के पक्ष में खड़े होने वाले लोगों में लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता गुरमेहर कौर (जिन्हें टाइम मैगजीन द्वारा 'नेक्स्ट जेन' लीडर के रूप में भी जाना जाता है) और जानी-मानी हस्ती डॉ. गिरिजा शेटकर जैसे नाम भी शामिल हो गए हैं। इन सभी ने सोशल मीडिया पर अपनी पोस्ट के जरिए स्पष्ट संदेश दिया है कि कला, इतिहास के विजुअल रिकॉर्ड और सच की आवाज़ को इस तरह डराकर या दबाया नहीं जा सकता।
समर्थकों और कला प्रेमियों का कहना है कि प्रशासन भले ही एग्जीबिशन हॉल की दीवारों से तस्वीरें हटवा दे, लेकिन वह जनता तक सच्चाई के पहुंचने को नहीं रोक सकता। जब तस्वीरें हटाई गईं, तो खाली दीवारों पर सन्नाटा पसर गया था, जिसके विरोध में वहां संविधान की प्रस्तावना की प्रतियां लगानी पड़ी थीं। अब 'एक्स' पर हो रही इन लगातार पोस्ट्स और तीखी टिप्पणियों ने इस स्थानीय विवाद को एक राष्ट्रीय बहस में बदल दिया है।
फिलहाल, इस डिजिटल एकजुटता और दिग्गजों के मुखर समर्थन ने यह साबित कर दिया है कि आज के दौर में कला और स्वतंत्र विचारों पर अंकुश लगाने के किसी भी प्रयास को आसानी से स्वीकार नहीं किया जाएगा। यह घटनाक्रम इस बात की गवाही दे रहा है कि लोकतंत्र में अभिव्यक्ति के नए और मजबूत रास्ते हमेशा बने रहेंगे।