सिस्टम के दीमकों ने जनता की इस प्यास को ही अपनी कमाई का जरिया बना लिया। जिले में करीब 1599.16 करोड़ रुपए का भारी-भरकम बजट पानी की तरह बहा दिया गया, लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात रहा।
बुंदेलखंड की धरती हमेशा से पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसती रही है, लेकिन जब केंद्र सरकार ने जल जीवन मिशन के जरिए हर घर तक नल पहुंचाने का बीड़ा उठाया, तो छतरपुर की जनता को उम्मीद की एक किरण दिखी थी। मगर अफसोस, सिस्टम के दीमकों ने जनता की इस प्यास को ही अपनी कमाई का जरिया बना लिया। जिले में करीब 1599.16 करोड़ रुपए का भारी-भरकम बजट पानी की तरह बहा दिया गया, लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात रहा। 1078 गांवों में पानी पहुंचाने का लक्ष्य रखने वाला विभाग आज केवल 238 गांवों तक सिमट कर रह गया है। 7 दिसंबर 2025 की समय सीमा बीत चुकी है, लेकिन प्रशासन के पास अब केवल नई तारीखों का झुनझुना बचा है।
परियोजनाओं में सबसे बड़ी विफलता धसान नदी पर चल रही योजना में नजर आती है। 319 करोड़ रुपए की लागत से तरपेड बांध के जरिए 143 गांवों की प्यास बुझानी थी। गुजरात की एलसीसी कंपनी को इसका ठेका मिला, लेकिन यहां विकास की तस्वीर डरावनी है। इंटकवेल, फिल्टर प्लांट और पानी की टंकियों का निर्माण वर्षों से अधूरा पड़ा है। पाइपलाइन बिछाने के नाम पर सडकों को खोदकर छोड़ दिया गया, लेकिन उनमें पानी कब आएगा, इसका जवाब किसी के पास नहीं है। यह कहना गलत नहीं होगा कि 319 करोड़ की यह योजना धरातल के बजाय फाइलों में ही पूरी होकर दम तोड़ रही है।
यही हाल बकस्वाहा और बिजावर क्षेत्र का है, जहां 250 करोड़ रुपए की बहु ग्राम ग्रामीण जल आपूर्ति योजना स्वीकृत हुई थी। लक्ष्य था 120 गांवों को लाभान्वित करना, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि केवल 12 गांवों तक पाइपलाइन पहुंच पाई है। एलएंडटी जैसी बड़ी कंपनियों को ठेका देने के बाद भी हजारों मीटर पाइपलाइन का काम अधूरा है। ग्रामीण आज भी मीलों पैदल चलकर पानी भरने को मजबूर हैं, जबकि फाइलों में करोड़ों के भुगतान हो चुके हैं।भ्रष्टाचार का लवकुशनगर मॉडल और बिना काम के भुगतानजल जीवन मिशन में धांधली इस कदर हावी है कि लवकुशनगर क्षेत्र में बिना काम किए ही करोड़ों के भुगतान की खबरें सामने आ रही हैं। मुरैना की आर्यन कंस्ट्रक्शन कंपनी पर आरोप हैं कि उसने बिना काम पूरा किए भुगतान हासिल कर लिया। जिले के जिम्मेदार अधिकारी इन कंपनियों पर शिकंजा कसने के बजाय उन्हें संरक्षण देते नजर आ रहे हैं। यही कारण है कि मिशन की रफ्तार कछुआ चाल से भी धीमी हो गई है।
एक तरफ उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य ने 100 प्रतिशत लक्ष्य हासिल कर लिया है, वहीं मध्यप्रदेश इस मामले में देश के सबसे पिछड़े राज्यों की कतार में खड़ा है। प्रदेश में औसत काम 60 प्रतिशत हुआ है, लेकिन छतरपुर का रिपोर्ट कार्ड तो इससे भी बदतर है। यहां 790 गांव आज भी सरकारी उपेक्षा और भ्रष्टाचार की वजह से पानी को मोहताज हैं। विभाग अब लक्ष्य को बढ़ाकर जून और अगस्त 2026 तक ले जाने की तैयारी कर रहा है, जो जनता के साथ एक भद्दा मजाक है।
विकासखंड बजट (करोड़) लक्ष्य (गांव) वर्तमान हकीकत
राजनगर (कुटने बांध) 273.92 131 आधा-अधूरा पाइपलाइन नेटवर्क
नौगांव 195.99 118 लक्ष्य से कोसों दूर
गौरिहार 560.25 278 भारी भरकम बजट, पर काम नगण्य
छतरपुर 319.00 143 धसान परियोजना की भेंट चढ़ा विकास
बकस्वाहा-बिजावर 250.00 120 केवल 12 गांवों में सुविधा
जल आवंटन के स्रोतों में तकनीकी दिक्कतों की वजह से देरी हो रही है। हम जल्द ही शेष 790 गांवों तक पानी पहुंचाने का प्रयास करेंगे।राघवेंद्र सिंह नरोलिया, डिप्टी मैनेजर, जल निगम