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GDP Contribution: 16वां वित्त आयोग- विकास और संतुलन के बीच नई डगर

देश के कुल सार्वजनिक खर्च का लगभग दो-तिहाई हिस्सा राज्य उठाते हैं, लेकिन राजस्व के संसाधनों पर उनका नियंत्रण केवल एक-तिहाई ही है। संसाधनों और जिम्मेदारियों का यही असंतुलन आगे चलकर वित्तीय तनाव की वजह बनता है।

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Feb 18, 2026
देश के कुल सार्वजनिक खर्च का लगभग दो-तिहाई हिस्सा राज्य उठाते हैं...

डॉ. अजीत रानाडे,

भारत के राजकोषीय संघवाद की व्यवस्था दिखने में बेहद सीधी है, लेकिन भीतर से काफी जटिल समझौते पर टिकी है। केंद्र सरकार के पास अधिकांश बड़े करों को वसूलने की शक्ति है, जबकि जनता से सीधे जुड़ी शिक्षा, स्वास्थ्य, पुलिस, स्थानीय सड़कें और जल आपूर्ति जैसी बुनियादी सेवाओं की जिम्मेदारी सीधे राज्यों पर है। लेकिन कर संग्रह और खर्च की जिम्मेदारियों में संतुलन नहीं है। देश के कुल सार्वजनिक खर्च का लगभग दो-तिहाई हिस्सा राज्य उठाते हैं, लेकिन राजस्व के संसाधनों पर उनका नियंत्रण केवल एक-तिहाई ही है। संसाधनों और जिम्मेदारियों का यही असंतुलन आगे चलकर वित्तीय तनाव की वजह बनता है।

इसी असंतुलन को दूर करने के लिए संविधान ने एक निष्पक्ष मध्यस्थ की व्यवस्था की, जिसे वित्त आयोग कहा जाता है। इसका काम यह तय करना है कि केंद्र की ओर से वसूले गए करों के 'विभाज्य कोष' को किस तरह बांटा जाए: केंद्र और राज्यों के बीच (ऊर्ध्वाधर बंटवारा) और फिर राज्यों के बीच आपस में (क्षैतिज बंटवारा)। वित्त आयोग हर पांच साल में नया बनाया जाता है, ताकि समय के साथ बदलती परिस्थितियों के अनुसार बंटवारे का तरीका भी बदला जा सके; वह हमेशा के लिए जमे नहीं रहे। संविधान के अनुच्छेद 280 के तहत आयोग का गठन होता है और अनुच्छेद 281 के तहत उसकी सिफारिशों को लागू किया जाता है।

व्यवहार में देखा जाए तो वित्त आयोग की सिफारिशें भारतीय संघीय व्यवस्था की वित्तीय रीढ़ बन जाती हैं, क्योंकि इन्हीं के आधार पर राज्यों की आय, कल्याणकारी और पूंजीगत खर्च की क्षमता तथा उधार लेने की सीमा तय होती है। हाल में 16वें वित्त आयोग की रिपोर्ट को केंद्र सरकार ने स्वीकार कर संसद में रख दिया है। यह रिपोर्ट 2026 से 2031 तक केंद्र-राज्य वित्तीय संबंधों की दिशा तय करेगी। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि किसे कितना मिलेगा, बल्कि यह भी है कि नई व्यवस्था किस तरह के प्रोत्साहन पैदा करती है- खासकर ऐसे संघीय ढांचे में जहां आर्थिक समृद्धि और राजनीतिक प्रभाव का समान रूप से वितरण नहीं हैं।

इस वित्त आयोग ने राज्यों का हिस्सा पिछले आयोग की तरह 41 प्रतिशत ही बरकरार रखा है। हालांकि 22 राज्यों ने इसे बढ़ाकर 50 प्रतिशत करने की मांग की थी। उनकी शिकायत यह थी कि केंद्र सरकार उपकर (सेस) और अधिभार (सरचार्ज) जैसे करों का ज्यादा इस्तेमाल कर रही है। ये कर 'विभाज्य कोष' में शामिल नहीं होते, इसलिए राज्यों के साथ साझा भी नहीं किए जाते। अनुमान है कि आयोग की अवधि में विभाज्य कोष का कुल आकार लगभग दोगुना होकर 55 लाख करोड़ रुपए से बढ़कर 90 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच सकता है। यानी भले ही प्रतिशत वही रहे, लेकिन कुल रकम बढ़ने से राज्यों को पहले की तुलना में काफी अधिक संसाधन मिलेंगे। लेकिन यदि केंद्र गैर-साझा योग्य करों का दायरा बढ़ाता रहा, तो 41 प्रतिशत का आंकड़ा व्यवहार में कम महसूस हो सकता है।

इस रिपोर्ट की सबसे चौंकाने वाली और क्रांतिकारी बात यह है कि राज्यों के बीच आपसी बंटवारे में 'राष्ट्रीय जीडीपी में योगदान' को 10 प्रतिशत का महत्व (वेटेज) दिया गया है। इसके लिए आयोग ने प्रति व्यक्ति आय के अंतर और जनसांख्यिकीय प्रदर्शन जैसे पुराने मानकों में ढाई-ढाई प्रतिशत की कटौती की है।

यह बदलाव वित्तीय हस्तांतरण की नैतिक भाषा को बदल देता है। दशकों से आयोग का मुख्य लक्ष्य समानता रहा है, यानी पिछड़े राज्यों को इतनी मदद देना कि वे भी विकसित राज्यों के बराबर सेवाएं दे सकें। लेकिन नया पैमाना कुशलता को पुरस्कृत करता है। यह उन राज्यों के लिए एक तरह का बोनस है जो अपनी नीतियों से देश की आर्थिक प्रगति में बड़ा इंजन बन रहे हैं। जीडीपी योगदान को पैमाना बनाना एक दोधारी तलवार है। अमीर राज्यों के पास पहले से ही बेहतर ढांचा और संस्थागत मजबूती होती है, जिससे वे विकास के नए अवसरों का लाभ तुरंत उठा लेते हैं।

गरीब राज्यों के लिए यह दौड़ असमान है। उदाहरण के लिए, उत्तर और पूर्व के कई राज्य अपने वन क्षेत्र को बचाने या शहरीकरण को नियंत्रित रखने के कारण अपनी जीडीपी ग्रोथ को उस गति से नहीं बढ़ा पाते। ऐसे में जीडीपी योगदान को प्राथमिकता देने से विकसित और विकासशील राज्यों के बीच का फासला और अधिक बढ़ सकता है। इस नई व्यवस्था के दूरगामी व्यावहारिक प्रभाव होंगे। इससे दक्षिण और पश्चिम के राज्यों की यह शिकायत कम होगी कि हम देश की तिजोरी में ज्यादा पैसा डालते हैं, लेकिन हमें बदले में कम मिलता है। जिन राज्यों की अर्थव्यवस्था अब भी गैप-फिलिंग यानी कमी पूरी करने वाली मदद पर टिकी है, अब अपने अस्तित्व के लिए उनकी विशेष पैकेज या केंद्रीय योजनाओं पर निर्भरता बढ़ेगी।

यह सहकारी संघवाद के लिए जोखिम भरा भी हो सकता है, क्योंकि गरीब राज्यों को लग सकता है कि संकट के समय उनके पास मजबूत सुरक्षा कवच नहीं बचा है। 16वां वित्त आयोग एक बदलाव के साथ निरंतरता की मिसाल है। यह भारत के राजकोषीय ढांचे को सिर्फ खैरात या मदद देने वाली मानसिकता से निकालकर विकासोन्मुखी मॉडल की ओर ले जाता है। हालांकि, आरबीआई की ओर से केंद्र को दिए जाने वाले भारी अधिशेष जैसे मुद्दे अब भी अनसुलझे हैं। भारत की सफलता इस पर निर्भर करेगी कि हम एक ऐसा संतुलन कैसे बनाते हैं कि हर राज्य के नागरिक को समान गुणवत्तापूर्ण न्यूनतम सेवाएं मिलें और सुधार करने वाले राज्यों को उनकी मेहनत का फल भी। यदि संतुलन बिगड़ा, तो विवाद सिर्फ रुपए व प्रतिशत का नहीं रह जाएगा, बल्कि यह हमारे संविधान की साझा प्रगति की मूल भावना को भी चोट पहुंचा सकता है। 

Published on:
18 Feb 2026 01:56 pm
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