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किसी भी राज्य की स्वास्थ्य सुविधाओं से जुड़ी व्यवस्थाओं का असली चेहरा आंकड़ों में नहीं बल्कि अस्पतालों में मौजूद सुविधाओं से नजर आता है। सरकारें जब अस्पतालों में जरूरी सुविधाओं से ही कन्नी काटने लगे तो यह चिंता और बढ़ जाती है। राजस्थान के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल सवाई मानसिंह अस्पताल की ख्याति आसपास के दूसरे प्रदेशों तक है। लेकिन इस अस्पताल से जुड़ी यह चिंता बुजुर्गों से जुड़ी है।
एसएमएस में इम्प्लांट की कमी से महीनों से घुटना प्रत्यारोपण (नी-ट्रांसप्लांट) बंद होने और राजस्थान गवर्नमेंट हेल्थ स्कीम (आरजीएचएस) में बुजुर्गों के लिए जरूरी दवाएं सूची से गायब होने से सवाल सिर्फ प्रबंधन का ही नहीं, संवेदनशीलता का भी उठता है। तीन महीने से घुटना प्रत्यारोपण ठप हो और सैकड़ों बुजुर्ग अपनी बारी के लिए तारीखों पर तारीखें झेलने को मजबूर हों तब 'बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं' का दावा खोखला लगता है।
सवाल यह है कि जब नियमित रूप से ऑपरेशन होते रहे, तो इम्प्लांट आपूर्ति की वैकल्पिक योजना क्यों नहीं बनी? दूसरी ओर आरजीएचएस में कैल्शियम, आयरन, विटामिन और प्रोटीन जैसी मूलभूत दवाइयों का हटाया जाना बुजुर्गों के स्वास्थ्य पर सीधा प्रहार है। उम्र के इस पड़ाव पर यही दवाएं उनकी हड्डियों की मजबूती, पोषण और प्रतिरोधक क्षमता की नीव होती है।
यदि कुछ मेडिकल स्टोर्स में गड़बड़ी हुई, तो उसका समाधान निगरानी और पारदर्शिता है, न कि पूरी सूची से दवाएं हटाकर हजारों पेंशनर्स को बाजार की महंगाई के हवाले कर देना। यह नीति नहीं, सजा है। यह संकट सिर्फ स्वास्थ्य तंत्र की खामी नहीं, हमारी सामाजिक सोच का आईना भी है। समाधान कठिन नहीं, बस इच्छाशक्ति चाहिए। सरकार को चाहिए कि जीवन-रक्षक उपकरण और इम्प्लांट की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए वैकल्पिक आपूर्ति चैनल बनाएं। टेंडर प्रकिया को समयबद्ध व पारदर्शी करें। आरजीएचएस में आवश्यक पोषण वाली दवाइयों को तुरंत बहाल कर निगरानी तंत्र मजबूत किया जाए। हर जिले में ऑर्थोपेडिक व जेरियाट्रिक क्लीनिक में संसाधन बढ़ाए जाएं।
आशीष जोशी: ashish.joshi@in.patrika.com
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Updated on:
18 Feb 2026, 2:51 PM IST
Published on:
18 Feb 2026, 2:44 PM IST
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