
जनसाधारण के बीच जाकर उनके दु:ख-दर्द का पता लगाया जाए तब जाकर ही समस्याओं के समाधान की दिशा में काम हो सकता है। पुराने समय में शासक वर्ग इसी मकसद से भेष बदलकर जनता के बीच जाया करता था और जनता से मिले फीडबैक के आधार पर ही फैसले लिया करता था। जनता की परेशानियां कैसी हैं और उनका समाधान कैसे हो सकता है, यह जानकारी उनके बीच जाने से ही ली जा सकती है। कर्नाटक के परिवहन मंत्री बैरत सुरेश की आम यात्री के रूप में मास्क पहनकर बेंगलूरु महानगर परिवहन निगम (बीएमटीसी) की बस सेवाओं का जायजा लेने की पहल स्वागत योग्य कही जाएगी। बस सेवाएं ही नहीं बल्कि सीधे जनता से जुड़ी सेवाओं को लेकर सत्ता में बैठे लोग ऐसे ही जनता की सुध लें तो उन्हें फैसले लेने में सुविधा होगी, इतना तय है।
ऐसा नहीं है कि कर्नाटक के मंत्री ने ही पहली बार इस तरह जनता की परेशानियों को जानने की कोशिश की है। इससे पहले भी भेष बदलकर मंत्री व दूसरे जनप्रतिनिधि जनता के बीच जाते रहे हैं। लेकिन आज का शासक वर्ग यों कहलाता तो जनप्रतिनिधि है लेकिन सुरक्षा घेरे ने जनता से उसकी दूरियां बढ़ा दी है। चिंता इसी बात की है कि ऐसा करने वाले सत्ता में बैठे अधिकांश नेताओं में औचक निरीक्षण के नाम पर दिखावे की भावना ज्यादा रहने लगी है। इसीलिए कभी हमारे नेता साधारण बस में सफर करते तो कभी सरकारी स्कूलों में बच्चों को पढ़ाते और कभी अस्पतालों में मरीजों के हालचाल पूछने के उपक्रम करते रहते हैं। सरकारी अस्पतालों में तो इनके पैर आमतौर पर तब ही पड़ते हैं जब किसी नजदीकी की मिजाजपुर्सी के लिए जाना पड़े। न केवल कर्नाटक बल्कि देश के दूसरे राज्यों में भी शासक वर्ग ऐसी पहल करें तो कम से कम सार्वजनिक परिवहन, चिकित्सा, शिक्षा जैसी जनता से जुड़ी मूलभूत सुविधाओं में आमूल-चूल परिवर्तन लाया जा सकता है। आम जनता का दर्द तो यही रहता है कि चुनाव के समय जो लोग उनसे वोट मांगते हुए एक हाथ का फासला भी नहीं रखते, वे चुनाव जीतने और खास तौर से सत्ता में आने पर ऐसी दूरियां बना लेते हैं जैसे जानते ही नहीं हो। शासन सचिवालयों और मंत्रियों के बंगलों के आसपास तो आम आदमी रुख करने का साहस ही नहीं जुटा पाता। फरियादी बनकर पहुंच भी जाए तो कितनी सुनवाई होती है, यह किसी से छिपा नहीं।जन आक्रोश भी धरने, प्रदर्शन और आंदोलन के रूप में तब ही प्रकट होता है जब उनकी मांगों की अनदेखी की जाती है। जनता से जुड़े महकमों में कार्यरत अधिकारी-कर्मचारियों को भी जब यह लगेगा कि सत्तासीन लोग कभी भी, किसी भी रूप में जनता के हाल-चाल जानने मैदान में उतर सकते हैं तो वे भी आम आदमी की अनदेखी करने की जुर्रत नहीं करेंगे।