
AI जनरेटेड फोटो
शिक्षा का अधिकार महज कागजों में ही सुरक्षित होता नजर आए तो चिंता होना स्वाभाविक है। राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में सरकारी स्कूलों की बदहाली से जुड़ी तस्वीरें इस चिंता को बढ़ाने वाली है। बच्चों को शिक्षा का अधिकार देने की बातें भले ही कही जा रही हो लेकिन उसका स्कूल तक पहुंचने का अधिकार सुनिश्चित नहीं हो पाया है। कहीं बच्चे घुटनों तक पानी और कीचड़ पार कर स्कूल पहुंच रहे हैं, तो कहीं जर्जर भवनों के भय और टिनशेड की मजबूरी के बीच पढ़ाई कर रहे हैं। इन हालात को किसी और ने नहीं, बल्कि स्वयं सरकारी आंकड़ों ने स्वीकार किया है।
हर मानसून में ऐसे समाचार सामने आते हैं। छत गिरती है, प्लास्टर टूटता है, बच्चे घायल होते हैं, जांच बैठती है, जिम्मेदारों से जवाब मांगा जाता है और फिर अगली बारिश तक सब कुछ भुला दिया जाता है। सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि गांवों में वर्षों तक अधूरे भवन, टूटी सडक़ें और जल निकासी का अभाव किसी को विचलित नहीं करता। यह केवल विकास का असंतुलन नहीं, बल्कि अवसरों की असमानता भी है।
शिक्षा केवल पाठ्यपुस्तकों, स्मार्ट क्लास या डिजिटल बोर्ड से बेहतर नहीं होती। उसकी पहली शर्त है-सुरक्षित और सम्मानजनक विद्यालय। जिस बच्चे को रोज स्कूल पहुंचने के लिए पानी, कीचड़ और दुर्घटना का डर पार करना पड़े, उससे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की अपेक्षा करना बेमानी है। ऐसे वातावरण में शिक्षा नहीं, बल्कि संघर्ष का पाठ पढ़ाया जाता है।
विद्यालय भवनों का समयबद्ध सुरक्षा ऑडिट, जर्जर इमारतों का तत्काल पुनर्निर्माण, अधूरे निर्माण कार्यों को युद्धस्तर पर पूरा करना, स्कूलों तक पहुंचने वाले मार्गों और पुलिया की स्थायी व्यवस्था तथा मानसून से पहले जोखिम वाले विद्यालयों की विशेष समीक्षा अब विकल्प नहीं, अनिवार्यता होनी चाहिए। शिक्षा विभाग, पंचायत राज और लोक निर्माण विभाग के बीच बेहतर समन्वय भी उतना ही जरूरी है। जहां भविष्य स्कूलों में लिखा जाता है उन तक पहुंचने का रास्ता ही खतरे से भरा हो, तो विकास के दावे खोखले साबित होते हैं।
ashish.joshi@in.patrika.com
Copyright © 2026 Patrika Group. All Rights Reserved.
Updated on:
14 Jul 2026, 7:35 AM IST
Published on:
14 Jul 2026, 7:35 AM IST
बड़ी खबरें
View Allओपिनियन




