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रेगिस्तान की धरती पर पानी केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन की सबसे बड़ी उम्मीद होता है। राजस्थान में जहां हर बूंद की कीमत समझी जाती है, वहीं विडंबना यह है कि वही प्रदेश अपने वेटलैंड तालाबों, झीलों, नाड़ियों और जलाशयों को धीरे-धीरे मरने के लिए छोड़ रहा है। यह केवल पर्यावरणीय संकट नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य पर मंडराता खतरा है।
प्रदेश में 46 हजार से अधिक वेटलैंड्स हैं, लेकिन उनमें से केवल 76 ही नोटिफाइड हैं। इससे भी अधिक चिंताजनक यह है कि जिन्हें कानूनी संरक्षण मिला, वे भी सीवरेज, कचरे, अतिक्रमण और सरकारी उदासीनता के शिकार हैं। उदयपुर का मेनार वेटलैंड, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रामसर साइट का दर्जा मिला, वहां गांव का गंदा पानी बह रहा है। अजमेर की आनासागर झील में 13 नालों का दूषित पानी गिर रहा है। खींचन, जहां हजारों कुरजां पक्षी दुनिया भर के पर्यटकों को आकर्षित करते हैं, वहां जल स्रोत उपेक्षा की सांसें गिन रहे हैं। भरतपुर का केवलादेव, जो कभी पक्षियों का स्वर्ग माना जाता था, अब सिकुड़ते वेटलैंड क्षेत्र की पीड़ा झेल रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या हम केवल ‘रामसर साइट’ का तमगा लगाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान बैठे हैं? अंतरराष्ट्रीय पहचान सम्मान जरूर देती है, लेकिन उससे कहीं अधिक जिम्मेदारी भी मांगती है। दुर्भाग्य से हमारे यहां संरक्षण कागजों और बैठकों तक सीमित होकर रह गया है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने वेटलैंड्स की सीमाएं तय करने और बाउंड्री पिलर्स लगाने के आदेश दिए, लेकिन अमल आज तक शुरू नहीं हुआ। योजनाएं बनीं, प्रस्ताव भेजे गए, फाइलें चलीं, लेकिन धरातल पर बदलाव नहीं दिखा।
असल में वेटलैंड केवल पानी भरे गड्ढे नहीं होते। ये प्रकृति की ‘किडनी’ हैं, जो जल को शुद्ध करते हैं। ये भूजल का सबसे बड़ा बैंक हैं, जो धरती की प्यास बुझाते हैं। ये बाढ़ को रोकते हैं, तापमान संतुलित रखते हैं और हजारों जीव-जंतुओं व प्रवासी पक्षियों को जीवन देते हैं। जब वेटलैंड सूखते हैं, तो केवल पानी नहीं खत्म होता, बल्कि पूरा पारिस्थितिकी तंत्र बीमार पड़ने लगता है।
राजस्थान जैसे राज्य में, जहां जल संकट हर साल गहराता जा रहा है, वहां वेटलैंड्स का संरक्षण विकल्प नहीं, आवश्यकता है। विडंबना यह है कि जिन वेटलैंड्स को बचाने के लिए बजट आता है, वह भी दूसरी जल योजनाओं में खर्च हो जाता है। संरक्षण के नाम पर केवल नोटिफिकेशन और सर्वेक्षण हो रहे हैं, जबकि जरूरत है ठोस प्रबंधन, नियमित निगरानी और जनभागीदारी की।
यह भी समझना होगा कि वेटलैंड्स का भविष्य केवल सरकार के भरोसे नहीं बच सकता। गांवों, शहरों और समाज को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। जिस दिन लोग तालाबों को ‘खाली जमीन’ नहीं, बल्कि ‘जल जीवन’ मानने लगेंगे, उस दिन बदलाव शुरू होगा।
राजस्थान की सभ्यता तालाबों और बावड़ियों के इर्द-गिर्द पली-बढ़ी है। यदि आज हमने अपने वेटलैंड को नहीं बचाया, तो आने वाली पीढ़ियां केवल किताबों और तस्वीरों में पक्षियों का कलरव और पानी से भरे तालाब देख पाएंगी।
आशीष जोशी: ashish.joshi@in.patrika.com
Updated on:
06 Jun 2026 07:24 am
Published on:
06 Jun 2026 07:24 am
