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के. एस. तोमर,(सामरिक मामलों के स्तंभकार एवं वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक)
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सत्ता परिवर्तन प्राय: अनिश्चितता का कारण बनते हैं। किंतु ब्रिटेन के नए प्रधानमंत्री के रूप में एंडी बर्नहम के उदय को नई दिल्ली आशंका नहीं, बल्कि सतर्क आशावाद के साथ देख रही है। ब्रेक्जिट के बाद पैदा हुई अनिश्चितताओं और पिछले एक दशक में ब्रिटेन में प्रधानमंत्रियों के तेजी से बदलते दौर के विपरीत, बर्नहम के नेतृत्व से भारत-ब्रिटेन संबंधों की मूल दिशा बदलने की संभावना नहीं है। बल्कि इसे अब तक हुई प्रगति को नई गति देने और दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी को और गहरा करने का अवसर माना जा रहा है। ऐसे में भारत के लिए वास्तविक प्रश्न यह है कि बर्नहम सरकार पहले से हुए समझौतों को कितनी प्रभावी ढंग से लागू करती है।
अब ध्यान नए समझौते करने से अधिक मौजूदा समझौतों को धरातल पर उतारने पर है। हाल ही संपन्न व्यापक आर्थिक एवं व्यापार समझौते, जिसके माध्यम से दीर्घकाल में दोनों देशों के बीच वार्षिक व्यापार में लगभग 25.5 अरब पाउंड की वृद्धि का अनुमान है, के साथ निवेश, रक्षा सहयोग और अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी साझेदारी आने वाले वर्षों में द्विपक्षीय संबंधों का केंद्र होंगे। भारत-ब्रिटेन के बीच 42 अरब पाउंड से अधिक का द्विपक्षीय व्यापार है। ब्रिटेन में 970 से अधिक भारतीय कंपनियां कार्यरत हैं, जो एक लाख से अधिक लोगों को रोजगार देती हैं, जबकि ब्रिटेन भारत में जी-20 देशों के प्रमुख निवेशकों में शामिल है। रक्षा विनिर्माण, एआइ, साइबर सुरक्षा, स्वच्छ ऊर्जा, फिनटेक, सेमीकंडक्टर और उच्च शिक्षा में सहयोग बढ़ रहा है। ऐसे में भारत चाहता है कि सीईटीए का शीघ्र क्रियान्वयन हो, पेशेवरों की आवाजाही आसान बने, नियामकीय प्रक्रियाएं पारदर्शी हों तथा निवेश, नवाचार और अनुसंधान में साझेदारी को नई गति मिले।
किसी भी व्यापार समझौते की सफलता उसके परिणामों से तय होती है। यदि बर्नहम सरकार पुराने समझौतों को दोबारा खोलने के बजाय उन्हें लागू करने पर ध्यान देती है, तो ब्रेक्जिट के बाद भारत-ब्रिटेन आर्थिक संबंधों का सबसे सशक्त दौर शुरू हो सकता है। बर्नहम ऐसे समय सत्ता संभाल रहे हैं जब ब्रिटेन अनेक घरेलू चुनौतियों से जूझ रहा है। जीवन-यापन की बढ़ती लागत, धीमी आर्थिक वृद्धि, आवास संकट, सार्वजनिक सेवाओं पर बढ़ता दबाव तथा क्षेत्रीय असमानताएं उनकी सरकार की पहली परीक्षा होंगी। ब्रिटेन का सार्वजनिक ऋण सकल घरेलू उत्पाद के लगभग 100 प्रतिशत तक पहुंच चुका है, जिससे वित्तीय गुंजाइश भी सीमित हो गई है। ऐसे में भारत ब्रिटेन के लिए निवेश, रोजगार और निर्यात बढ़ाने वाला महत्त्वपूर्ण साझेदार बन सकता है। भारत-ब्रिटेन संबंधों का दूसरा प्रमुख आधार सामरिक सहयोग है। यूक्रेन युद्ध, चीन की बढ़ती आक्रामकता, हिंद-प्रशांत क्षेत्र की प्रतिस्पर्धा, साइबर सुरक्षा और आतंकवाद जैसे मुद्दों ने दोनों देशों को और करीब लाया है। रक्षा सहयोग अब सैन्य अभ्यासों से आगे बढ़कर संयुक्त अनुसंधान, रक्षा उत्पादन, समुद्री सुरक्षा और आपूर्ति शृंखलाओं की सुरक्षा तक पहुंच गया है। आतंकवाद और साइबर सुरक्षा पर खुफिया साझेदारी भी लगातार मजबूत हुई है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में ब्रिटेन की बढ़ती सक्रियता ने समुद्री सुरक्षा और नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था को मजबूत करने में भारत के साथ सहयोग के नए अवसर पैदा किए हैं।
ये साझा सामरिक हित किसी एक सरकार पर निर्भर नहीं हैं, इसलिए एंडी बर्नहम के नेतृत्व में इनके कमजोर पडऩे की संभावना नहीं है। बर्नहम के सामने सबसे कठिन विदेशी नीति चुनौती अमरीका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के साथ संबंधों का संतुलन साधना होगी। ब्रिटेन न तो वाशिंगटन से दूरी बना सकता है और न ही उसके बिना अपनी वैश्विक भूमिका की कल्पना कर सकता है। अमरीका उसका सबसे महत्त्वपूर्ण रक्षा सहयोगी, 'फाइव आइज' खुफिया नेटवर्क का प्रमुख साझेदार और सबसे बड़े व्यापारिक भागीदारों में से एक है।
दूसरी ओर, लेबर पार्टी की राजनीतिक सोच ट्रंप की संरक्षणवादी और लेन-देन आधारित विदेश नीति से कई मामलों में भिन्न है। ऐसे में बर्नहम को जलवायु परिवर्तन, शुल्क नीति, बहुपक्षीय संस्थाओं और वैश्विक शासन जैसे विषयों पर मतभेदों के बावजूद संस्थागत सहयोग बनाए रखना होगा। ट्रांस-अटलांटिक संबंधों की बुनियाद मजबूत रहेगी, किंतु उसमें व्यक्तिगत गर्मजोशी की जगह अधिक व्यावहारिक और संस्थागत दृष्टिकोण दिखाई देगा। भारत ब्रिटेन की विदेश नीति और अमरीका के साथ उसके संतुलन पर भी नजर रखेगा। प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम पहले ही नाटो, ब्रिटेन की स्वतंत्र परमाणु प्रतिरोधक क्षमता और यूक्रेन को सैन्य, कूटनीतिक तथा वित्तीय सहायता जारी रखने की प्रतिबद्धता जता चुके हैं।
इससे स्पष्ट है कि ब्रिटेन की मूल सुरक्षा नीतियों में बड़ा बदलाव नहीं होगा, कुल मिलाकर, बर्नहम का कार्यकाल भारत नीति में बड़े बदलाव का संकेत नहीं देता। ब्रिटेन को विश्वसनीय आर्थिक साझेदार और भारत को प्रौद्योगिकी, निवेश व सुरक्षा के क्षेत्र में भरोसेमंद सहयोगी की जरूरत है। इसलिए दोनों देशों के संबंधों की सफलता नई घोषणाओं नहीं, बल्कि मौजूदा समझौतों के प्रभावी क्रियान्वयन से तय होगी। यदि ऐसा होता है, तो बर्नहम का कार्यकाल भारत-ब्रिटेन संबंधों का सबसे फलदायी दौर बन सकता है।
Updated on:
23 Jul 2026 04:16 pm
Published on:
23 Jul 2026 04:16 pm
