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जोसेप बोरेल स्पेन के पूर्व विदेश मंत्री,(प्रोजेक्ट सिंडिकेट)
किसी संस्था के पतन के पीछे हमेशा कोई बड़ा घोटाला या सनसनीखेज घटना ही नहीं होती। कई बार यह पूरी तरह प्रक्रियागत ढंग से घटित होता है, जहां विध्वंसकारी कदमों को सद्भावनापूर्ण जांच और जवाबदेही की भाषा के पीछे छिपाया जाता है। लोगों को षड्यंत्र समझ में आने तक काफी नुकसान हो चुका होता है। हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय (आइसीसी) के मुख्य अभियोजक करीम खान के खिलाफ चल रहे अभियान में ठीक यही होता दिख रहा है। हाल की घटनाएं इस उद्देश्य के लिए अमरीका और इजराइल के पिछले कई महीनों से प्रयासों को पूरा करती प्रतीत होती हैं।
कहानी अप्रेल 2024 से शुरू होती है। तब अमरीकी सीनेटरों के एक समूह ने खान को चेतावनी, बल्कि सीधी धमकी दी थी कि यदि उन्होंने इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के खिलाफ युद्ध अपराधों के लिए गिरफ्तारी वारंट जारी कराने की कोशिश की, तो वह स्वयं भी निशाने पर आ जाएंगे। लेकिन खान ने बिना डरे नेतन्याहू, इजराइल के तत्कालीन रक्षा मंत्री योआव गैलेंट और हमास के एक कमांडर के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी करने की मांग की। वह पहले भी रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, फिलीपींस के पूर्व राष्ट्रपति रोड्रिगो दुतेर्ते और तालिबान नेतृत्व के लिए इस तरह की मांग कर चुके थे। अब उनके विरोधियों ने यौन दुराचार के आरोपों का सहारा लेकर उन्हें पद से हटाने की बहस छेड़ दी है। यह उस संस्था की विफलता का उत्कृष्ट उदाहरण है जो अपने ही आंतरिक मामलों पर उन सिद्धांतों, विशेषकर कानून का शासन को लागू नहीं कर पा रही, जिन्हें उसे विश्व स्तर पर बनाए रखना चाहिए। हालांकि आइसीसी द्वारा गठित एक आंतरिक न्यायिक पैनल ने इन आरोपों पर अपनी जांच में उपलब्ध साक्ष्यों को दुराचार सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं पाया। इसके बावजूद, खान को हटाने पर आमादा लोग मैदान में डटे हैं। ताजा घटनाक्रम में आइसीसी के सदस्य देश दो अलग-अलग सवालों का घालमेल कर एक ही मतदान में शामिल करने की तैयारी कर रहे हैं। पहला यह कि क्या गंभीर कदाचार हुआ, और दूसरा यह कि क्या अभियोजक को हटाया जाना चाहिए। यह कोई साधारण प्रक्रियागत कदम नहीं है। यदि इन दोनों प्रश्नों को एक साथ जोड़ दिया गया, तो बिना सिद्ध हुए आरोपों के आधार पर या फिर किसी बिल्कुल अलग मुद्दे के आधार पर भी अभियोजक को हटाया जा सकेगा।
उदाहरण के लिए, किसी वरिष्ठ पद पर रहते हुए आपसी सहमति से बने निजी संबंध को आधार बनाया जा सकता है, जबकि ऐसा आरोप कभी लगाया ही नहीं गया। चूंकि करीम खान का मामला स्पष्ट रूप से आइसीसी के खिलाफ एक बड़े हमले का हिस्सा है, इसलिए इस न्यायालय के विरोधियों और उनके उद्देश्य को पहचानना आवश्यक है। 13 जुलाई को अमरीकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो का 'द वॉल स्ट्रीट जर्नल' में एक लेख छपा, जिसका शीर्षक ही स्पष्ट था, 'हम अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय को क्यों खत्म कर रहे हैं।' यह केवल राजनीतिक बयानबाजी नहीं थी। अमरीका पहले ही खान, दो उप-अभियोजकों और आठ न्यायाधीशों सहित 11 वरिष्ठ आइसीसी अधिकारियों पर प्रतिबंध लगा चुका है। इन सभी के बैंक खाते फ्रीज कर दिए गए हैं। रुबियो यहीं नहीं रुके। उन्होंने न्यायालय को अमरीका विरोधी सरकारों का औजार बताते हुए उन सभी सहयोगियों को एकजुट करने के लिए एक कूटनीतिक अभियान की घोषणा की, जो अमरीका को फिर से महान बनाने के सिद्धांत का समर्थन करते हैं।
इसके अलावा,'फाइनेंशियल टाइम्स' के अनुसार जब मई में अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की मुलाकात चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से हुई, तो उन्होंने सुझाव दिया कि चीन और रूस न्यायालय का विरोध करने में उनका साथ दें। यह तथ्य खान के खिलाफ इस अभियान के वास्तविक उद्देश्य को अधिक बयान करता है। इस मामले में अमरीकी और इजराइली नेता सुनिश्चित करना चाहते हैं कि कोई भी अंतरराष्ट्रीय अदालत उनके सैनिकों, सीमा सुरक्षा बलों या उनके सहयोगियों को छू न सके, चाहे युद्ध अपराधों और मानवता के खिलाफ अपराधों के आरोप कितने ही गंभीर क्यों न हों।दोनों के लिए खान प्रकरण आइसीसी की शक्ति कुंद करने का एक बेहतरीन अवसर है। यदि न्यायालय के सदस्य देश ही भीतर से उसे खोखला कर दें और उस व्यक्ति के खिलाफ राजनीतिक मतदान करा दें, जिसने उनके लिए सबसे असुविधाजनक गिरफ्तारी वारंट जारी किए थे, तो फिर बाहर से इस संस्था को नष्ट करने की आवश्यकता ही नहीं रह जाएगी। इसलिए इस संस्था का गठन करने वाली रोम संविधि के सदस्य देशों को ऐसा निर्णय लेना है, जिसका प्रभाव केवल इस मामले तक सीमित नहीं रहेगा। वे या तो ऐसी प्रक्रिया की मांग कर सकते हैं, जो उस संस्था की गरिमा के अनुरूप हो, जिसे उन्होंने स्वयं बनाया है और जिसके तहत आइसीसी के अपने अभियोजक को भी वही निष्पक्ष कानूनी प्रक्रिया मिले, जिसकी अपेक्षा यह न्यायालय दुनिया के हर देश से करता है। या फिर वे ऐसी मिसाल कायम करें, जिसमें न्यायिक निष्कर्षों पर राजनीति हावी हो जाए। सही विकल्प स्पष्ट है। आइसीसी को एक स्वतंत्र न्यायालय बने रहना चाहिए। उसे उन लोगों के सामने झुकना नहीं चाहिए, जो उसे 'ईंट-दर-ईंट' गिराना चाहते हैं। खान ने उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी करने का साहस और दृढ़ता दिखाई है, जिन्हें कभी इस न्यायालय की पहुंच से बाहर और अनछुआ माना जाता था। ऐसे समय में, जब अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्याय व्यवस्था और कानून के शासन पर चारों ओर से अभूतपूर्व हमला हो रहा है, करीम खान विश्व समुदाय की मान्यता और समर्थन के पात्र हैं।
Updated on:
22 Jul 2026 01:59 pm
Published on:
22 Jul 2026 01:59 pm
