
MAHILA YOJNA
डॉ. पी. एस. वोहरा, (आर्थिक मामलों के जानकार)
क्या महिला के बैंक खाते में सरकार की आर्थिक योजनाओं के माध्यम से हर महीने पहुंचने वाले 1,000 या 1,500 रुपए पूरे परिवार की आर्थिक सोच को बदल सकते हैं? क्या इतनी छोटी राशि बचत की आदत विकसित कर सकती है, बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य पर अधिक खर्च को प्रोत्साहित कर सकती है, महिलाओं को आर्थिक निर्णयों में अधिक सक्षम बना सकती है तथा परिवार की वित्तीय स्थिरता को मजबूत कर सकती है? यदि इन प्रश्नों का उत्तर 'हां' है, तो यह स्वीकार करना होगा कि भारत की कल्याणकारी नीतियां एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी हैं और फ्रीबीज ने महिलाओं को बदल दिया है। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद का जुलाई 2026 का अध्ययन इसकी पुष्टि करता है। इसमें महाराष्ट्र की मुख्यमंत्री माझी लाडकी बहिण योजना और ओडिशा की सुभद्रा योजना का विश्लेषण बताता है कि महाराष्ट्र में लाभार्थी महिलाओं की बैंक बचत में लगभग 84 प्रतिशत तथा मासिक व्यय में 46 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। वहीं ओडिशा में बचत लगभग 45 प्रतिशत और व्यय 28 प्रतिशत बढ़ा।
खास बात यह है कि महिलाओं ने अतिरिक्त राशि का बड़ा हिस्सा भविष्य की जरूरतों के लिए बचा कर रखा है, जिससे स्पष्ट होता है कि ऐसी योजनाएं केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि वित्तीय सशक्तीकरण का माध्यम भी बन रही हैं। भारत में महिलाओं के लिए बिना शर्त प्रत्यक्ष नकद सहायता की शुरुआत 2013 में गोवा से हुई, जिसे बाद में 2020 में असम ने आगे बढ़ाया। इसके बाद यह पहल कई राज्यों में फैलते हुए चुनावी वादों का भी हिस्सा बन गई। आज 15 से अधिक राज्यों में ऐसी योजनाएं संचालित हैं, जिनसे करीब 12 करोड़ महिलाएं लाभान्वित हो रही हैं और राज्यों द्वारा इन पर प्रतिवर्ष लगभग 1.7 लाख करोड़ रुपए खर्च किए जा रहे हैं। आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्ययन के अनुसार, इस सहायता राशि का सबसे अधिक उपयोग महिलाओं ने बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवार की आवश्यकताओं पर किया है। इससे महिलाओं की बैंकिंग व्यवस्था में भागीदारी भी बढ़ी है।
हालांकि, महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि क्या इन योजनाओं का बढ़ता दायरा लंबे समय तक आर्थिक रूप से टिकाऊ रहेगा। क्योंकि ये सभी राज्यों के लिए अतिरिक्त वित्तीय बोझ हैं, इसलिए राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच इनका विस्तार आर्थिक विवेक और वित्तीय अनुशासन के साथ करना भी उतना ही आवश्यक है। १६वें वित्त आयोग के अनुसार, बड़े पैमाने पर नकद सहायता योजनाओं पर होने वाला खर्च वर्ष 2018-19 के लगभग 3 प्रतिशत से बढ़कर कुल राजस्व सब्सिडी के 20 प्रतिशत से अधिक हो गया है। वहीं, पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च का आकलन है कि ऐसी योजनाएं चलाने वाले कई राज्यों पर राजस्व घाटे और बढ़ते ऋण का दबाव बढ़ सकता है। ऐसे में चुनौती यह है कि सरकारें इन योजनाओं के साथ शिक्षा, स्वास्थ्य और आधारभूत ढांचे पर निवेश का संतुलन कैसे बनाए रखेंगी, ताकि भविष्य की पीढिय़ों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ न पड़े।
किसी भी लोकतंत्र में सामाजिक सुरक्षा आवश्यक है, लेकिन यदि उसका वित्तपोषण उत्पादक निवेश की कीमत पर होने लगे, तो आज का सामाजिक लाभ कल की आर्थिक कमजोरी में भी बदल सकता है। अब जरूरत है कि इस सहायता को महिला कौशल विकास, महिला उद्यमिता, महिला स्वरोजगार जैसी पहलों से जोडऩा होगा। यदि प्रत्यक्ष नकद सहायता महिलाओं की आय के साथ उनकी उत्पादक क्षमता भी बढ़ाए, तो उसका आर्थिक और सामाजिक प्रभाव कई गुना अधिक होगा।
केंद्र और राज्यों की विभिन्न योजनाओं का समन्वय भी आवश्यक है। सकारात्मक तथ्य ये भी है कि इन योजनाओं ने महिलाओं की आर्थिक भूमिका बदली है। इसने सिद्ध कर दिया है कि महिलाओं के हाथ में पहुंचा धन बचत, सम्मान, निर्णय क्षमता और परिवार की आर्थिक सुरक्षा भी बढ़ाता है। अब चुनौती यह सुनिश्चित करने की है कि यह परिवर्तन आर्थिक आत्मनिर्भरता और टिकाऊ विकास का आधार बने। भारत की सफलता इस बात से तय होगी कि उस पैसे ने कितनी महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया। इसलिए आवश्यकता इन योजनाओं को अब अगले चरण में ले जाने की है।
Updated on:
22 Jul 2026 03:01 pm
Published on:
22 Jul 2026 03:00 pm
