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भारतीयों के दिल की धड़कन ‘आकाशवाणी’

भारतीय इतिहास में रेडियो कई ऐतिहासिक घटनाओं का गवाह रहा है। तीन जून 1947 को भारत विभाजन की योजना की देश को जानकारी रेडियो के जरिए ही मिली। तब माउंट बेटन, नेहरू, जिन्ना और सरदार बलदेव सिंह ने रेडियो के ही माध्यम से अपने विचार रखे थे। 14-15 अगस्त 1947 की दरम्यानी रात को भारत की आजादी के बाद नेहरू के प्रसिद्ध भाषण ‘ट्रिस्ट विथ डेस्टिनी’ को देश ने रेडियो के जरिए सुना था। गांधी जी जिंदगी में सिर्फ एक बार 12 नवंबर 1948 को दिल्ली केंद्र आए थे। यहां से उन्होंने रेडियो के जरिए कुरुक्षेत्र स्थित शरणार्थियों को संबोधित किया था।
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भारत

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Opinion Desk

Jul 22, 2026

AllIndiaRadio

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उमेश चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार

आज का दिन भारतीय प्रसारण के इतिहास में विशेष महत्त्व है। आज ही के दिन ठीक 99 साल पहले 23 जुलाई 1927 को मुंबई में भारत में पहले व्यवस्थित और संस्थानिक प्रसारण की शुरुआत हुई थी। इस लिहाज से भारतीय प्रसारण आज से अपनी शतकीय सोपान की ओर बढ़ रहा है। इस शतकीय यात्रा में रेडियो की तकनीक में बहुत बदलाव हुआ है। पारंपरिक मीडियम वेब से लेकर शॉर्ट वेब होते हुए रेडियो अब एफएम यानी फ्रीक्वेंसी मॉड्यूल के साथ ही डिजिटल दौर में प्रवेश कर गया है। मीडिया के चरित्र में भी सौ साल में बहुत बदलाव हो गया है, लेकिन रेडियो आज भी संवाद और मनोरंजन के सहज संचार माध्यम के रूप में जिंदा है। आसानी से हर जगह उपलब्धता और विशेष तकनीक की वजह से आपदा के क्षणों में संचार के दूसरे माध्यमों की तुलना में रेडियो अब भी सबसे ज्यादा प्रभावी माध्यम बना हुआ है। समुद्री तूफानों, सुनामी, कश्मीर घाटी की बाढ़ आदि मौकों पर संवाद के लिए रेडियो ने अपनी ताकत और उपादेयता को बार-बार साबित किया है। देश से माओवादी और नक्सली आतंक का खात्मा हो चुका है, लेकिन एक दौर में विशेषकर बस्तर के नक्सली इलाकों में नक्सलियों से संवाद के लिए रेडियो का ही इस्तेमाल किया जाता था।

1926 में इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी का हुआ गठन
इसे संयोग ही कहेंगे कि जब रेडियो प्रसारण तकनीक का आविष्कार हुआ, उन दिनों देश गुलामी की जंजीरों से बंधा था। लेकिन यह भी नहीं भूलना चाहिए कि भारत में भी प्रसारण की प्रेरणा ब्रिटेन से मिली। रेडियो प्रसारण तकनीक के विकास के साथ ही 1922 में बीबीसी का गठन हो चुका था। हालांकि ब्रिटेन में इसके पहले ही निजी और शौकिया प्रसारण की शुरुआत हो चुकी थी। इसका असर भारत पर भी पड़ा। भारत में भी 1920 से 1926 के बीच तत्कालीन बंबई और कलकत्ता में रेडियो क्लबों की शुरुआत हुई। उन क्लबों ने अपने तरीके से प्रसारण के किंचित सफल और ज्यादातर असफल प्रयास भी किए। उन दिनों भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड इर्विन थे। अखबारों की तुलना में रेडियो प्रसारण की अहमियत और प्रभाव को इर्विन समझते थे। शायद यही वजह रही कि भारत में 1926 में इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी का गठन हुआ। कुछ रेकॉर्ड के मुताबिक बांबे प्रेसिडेंसी रेडियो क्लब ने जून 1923 में पहला रेडियो प्रसारण किया। इसके करीब पांच महीने बाद नवंबर 1923 में कलकत्ता रेडियो क्लब की स्थापना हुई। ऐसे ही प्रयास तत्कालीन मद्रास में भी हुए। लेकिन पहला व्यवस्थित और संस्थानिक रेडियो प्रसारण इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी ने 23 जुलाई 1927 को मुंबई से किया था। इसी वजह से भारत हर साल 23 जुलाई को प्रसारण दिवस के रूप में मनाता है। इसके महीने बाद 26 अगस्त 1927 को कलकत्ता से बांग्ला में प्रसारण शुरू हुआ।
इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी छह लाख की पूंजी से शुरू की गई थी। कंपनी ने रेडियो प्रसारण के लिए अंग्रेज सरकार से 13 सितंबर 1926 को करार हुआ, जिसके तहत उसने प्रसारण शुरू किया। कंपनी को पूंजी में से साढ़े चार लाख रुपए दोनों रेडियो केंद्रों की स्थापना में ही खर्च हो गए। उसकी आमदनी का स्रोत रेडियो लाइसेंस फीस थी, जो प्रति रेडियो दस रुपए थी। बहुत कोशिशों के बावजूद सिर्फ आठ हजार ही लाइसेंस दिए जा सके। तब प्रसारण डेढ़-डेढ़ किलोवाट के ट्रांसमीटरों से बमुश्किल तीस मील के ही दायरे में हो पा रहा था, लिहाजा रेडियो का प्रसार नहीं बढ़ा। कंपनी को रेडियो प्रसारण के लिए बड़ी रकम खर्च करनी पड़ रही थी। लिहाजा यह कंपनी 1930 में ही बंद हो गई।

आकाशवाणी का जिक्र हमारे पौराणिक ग्रंथों में
भारत में आधुनिक प्रसारण की ठोस बुनियाद रखने का श्रेय भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड लिनलिथगो और ब्रिटिश ब्राडकास्टिंग कंपनी के पूर्व प्रसारक लायनेड फील्डेन को जाता है। लिनलिथगो की पहल पर उद्योग और श्रम विभाग के अधीन अप्रेल 1930 में इंडियन स्टेट ब्राडकास्टिंग सर्विस की शुरुआत हुई। इसे रेडियो प्रसारण को नया रूप देना था। इसके बाद अगस्त 1935 में लायनेड फील्डेन को इस सर्विस का कंट्रोलर नियुक्त किया गया। फील्डेन को यह नाम पसंद नहीं आ रहा था। फील्डेन ने अपनी पुस्तक ‘नेचुरल बेंट’ में लिखा है कि उन्होंने लिनलिथगो को सुझाया कि ब्रॉडकास्टिंग शब्द कठिन है, जो आसानी से भारतीयों की जुबान पर नहीं चढ़ पाएगा। फिर यह नाम भारत सरकार अधिनियम के अनुकूल नहीं है। लिहाजा उन्होंने इसे ‘ऑल इंडिया रेडियो’ करने का सुझाव दिया। जिसे लिनलिथगो ने स्वीकार कर लिया। इसी के बाद आठ जून 1936 को ऑल इंडिया रेडियो के नाम से दिल्ली के अलीपुर के छह कमरों के एक घर से रेडियो प्रसारण शुरू हुआ। कुछ महीने बाद यह दफ्तर दिल्ली के संसद मार्ग स्थित नए बने प्रसारण भवन में आया और तब से लेकर अब तक दिल्ली केंद्र का प्रसारण वहीं से हो रहा है।
भारत का सार्वजनिक रेडियो तीन मई 2023 से सिर्फ आकाशवाणी के नाम से जाना जा रहा है। वैसे ऑल इंडिया रेडियो को आकाशवाणी नाम गांधी जयंती के दिन 1957 में दिया गया, जिसे अगले दिन से लागू किया गया। आकाशवाणी का जिक्र हमारे पौराणिक ग्रंथों में आकाश से आने वाली आवाज या देववाणी के रूप में खूब मिलता है। आकाशवाणी के नाम से मैसूर के विद्वान एमवी गोपालस्वामी ने 10 सितंबर 1935 से रेडियो प्रसारण शुरू किया था। यह प्रसारण केंद्र मैसूर राजमहल से कुछ सौ मीटर दूर स्थित है। 1938 में कलकत्ता में शॉर्ट वेब के प्रसारण की शुरूआत हुई थी, उस मौके पर प्रसारण के लिए ऑल इंडिया रेडियो ने गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर से एक कविता मांगी थी। टैगौर ने बांग्ला की जो कविता प्रसारण के लिए दी, उसमें भी रेडियो के लिए आकाशवाणी शब्द का प्रयोग हुआ है।

आजादी के बाद पहला रेडियो स्टेशन 16 जुलाई 1948 को हुआ शुरू
इसे संयोग ही कहेंगे कि जिस समय देश में रेडियो का विस्तार हो रहा था, उन्हीं दिनों स्वाधीनता आंदोलन चरम पर था। उसी दौरान 1942 में डॉक्टर राममनोहर लोहिया और ऊषा मेहता की अगुआई में मुंबई से कांग्रेस रेडियो और रंगून से सुभाष चंद्र बोस ने आजाद रेडियो का प्रसारण शुरू किया। बोस जहां अपने रेडियो के जरिए भारतीय जनता से संवाद कर रहे थे, कांग्रेस रेडियो भूमिगत ढंग से चलाया जा रहा था। जिसके जरिए कांग्रेस कार्यकर्ताओं और स्वतंत्रता आंदोलनकारियों को सूचनाएं दी जा रही थीं। उन्हीं दिनों अंग्रेज सरकार ने देश में नौ रेडियो प्रसारण केंद्र स्थापित किए। ये केंद्र दिल्ली, कोलकाता, मुंबई, लखनऊ, त्रिचिरापल्ली, चेन्नई, ढाका, पेशावर और लाहौर में थे। बंटवारे के बाद भारत के हिस्से छह रेडियो स्टेशन आए, जबकि पाकिस्तान को ढाका, पेशावर और लाहौर स्टेशन मिले। आजादी के बाद देश के पहले सूचना और प्रसारण मंत्रालय की जिम्मेदारी सरदार पटेल को मिली। उन्हें रेडियो की महत्ता का भान था। इसीलिए उन्होंने रेडियो के तेज विकास की नींव रखी। आजादी के बाद पहला रेडियो स्टेशन 16 जुलाई 1948 को शुरू हुआ। जिसका उद्घाटन सरदार पटेल ने किया था। स्वाधीन भारत में रेडियो का चरित्र और लक्ष्य क्या होगा, इसका संकेत सरदार पटेल के उस उद्घाटन भाषण में दिखता है। सार्वजनिक प्रसारक के रूप में रेडियो के लक्ष्य को एक तरह से मद्रास प्रांत के तत्कालीन प्रीमियर सी राजगोपालाचारी ने 1938 में ही रख दिया था। 16 जून 1938 को मद्रास रेडियो स्टेशन का उद्घाटन करते हुए राजगोपालाचारी ने रेडियो को लोक जागरण का महत्त्वपूर्ण माध्यम बताया था। साथ ही, उन्होंने संचार के तेज माध्यम के रूप में रेडियो का शिक्षा, स्वास्थ्य और कृषि संबंधी जानकारी देने के लिए करने पर जोर दिया था। यहां यह बताना जरूरी नहीं है कि सार्वजनिक प्रसारक के रूप में रेडियो आज भी यह भूमिका बखूबी निभा रहा है।

विशाल वटवृक्ष बना आकाशवाणी
भारतीय इतिहास में रेडियो कई ऐतिहासिक घटनाओं का गवाह रहा है। तीन जून 1947 को भारत विभाजन की योजना की देश को जानकारी रेडियो के जरिए ही मिली। तब माउंट बेटन, नेहरू, जिन्ना और सरदार बलदेव सिंह ने रेडियो के ही माध्यम से अपने विचार रखे थे। 14-15 अगस्त 1947 की दरम्यानी रात को भारत की आजादी के बाद नेहरू के प्रसिद्ध भाषण ‘ट्रिस्ट विथ डेस्टिनी’ को देश ने रेडियो के जरिए सुना था। गांधी जी जिंदगी में सिर्फ एक बार 12 नवंबर 1948 को दिल्ली केंद्र आए थे। यहां से उन्होंने रेडियो के जरिए कुरुक्षेत्र स्थित शरणार्थियों को संबोधित किया था। उसका सकारात्मक असर पड़ा। गांधी इसके बाद रेडियो के मुरीद हो गए थे। इस याद को आकाशवाणी ने 12 नवंबर के दिन को लोक प्रसारण दिवस के रूप में याद रखा है। 23 जुलाई 1927 को महज शौकिया प्रसारण से शुरू हुई आकाशवाणी का प्रसारण आज विशाल वटवृक्ष के रूप फैल चुका है। आज 232 केंद्रों, 304 चैनलों और 756 ट्रांसमीटरों के विशाल नेटवर्क के साथ आकाशवाणी दुनिया का सबसे बड़ा प्रसारक है। इसकी पहुंच देश के करीब 92 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र और 99 प्रतिशत जनसंख्या तक है। जिनके लिए 23 भाषाओं और 183 बोलियों में लगातार प्रसारण जारी है। कह सकते हैं कि सौ साल में प्रसारण आज देश की धडकऩ बन चुका है, जिसमें सूचनाएं हैं, संगीत है और लोकजागरण का संदेश भी।