
Photo: AI Genrated
वायु प्रदूषण का पहले से ही अनुमान लगाना महज तकनीकी अभ्यास ही नहीं, बल्कि लोगों की सेहत से जुड़ा मसला भी है। यदि यह अनुमान ही सटीक नहीं निकले तो फिर प्रदूषण की रोकथाम के प्रयास कैसे होंगे इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। जाहिर तौर पर न तो समस्या के समाधान की दिशा में कदम उठाए जा सकेंगे और न ही आम जनता अपनी सेहत की फिक्र कर सकेगी।
यह चिंता इसलिए भी है क्योंकि राजस्थान की राजधानी जयपुर की हवा न सिर्फ जहरीली ही हो रही, बल्कि उसे समझने की क्षमता भी उतनी ही धुंधली साबित हो रही है। वायु प्रदूषण के पूर्वानुमान का जो तंत्र आमजन को चेताने के लिए बनाया गया था, वही अब खुद 'अविश्वसनीय' बनता जा रहा है। 65 फीसदी से भी कम सटीकता वाला पूर्वानुमान न केवल वैज्ञानिक विफलता है, बल्कि नीति-निर्माण की कमजोरी का भी आईना है।
विडंबना यह कि जो मॉडल जयपुर शहर में फेल हो रहा है, उसी को अब अलवर-भिवाड़ी जैसे औद्योगिक और प्रदूषण के मामले में अधिक संवेदनशील क्षेत्रों में लागू करने की तैयारी हो रही है। जयपुर के मामले में जब तक यह स्पष्ट नहीं होगा कि प्रदूषण के प्रमुख स्रोत क्या हैं, वाहन, उद्योग, धूल या पराली...तब तक कोई भी मॉडल केवल अनुमान ही रहेगा, समाधान नहीं।
यही कारण है कि अब फिर से आइआइटी कानपुर की शरण ली जा रही है। यह कदम स्वागत योग्य जरूर है, लेकिन यह भी दर्शाता है कि पहले की कवायद अधूरी और जल्दबाजी में की गई थी। जयपुर में छह मॉनिटरिंग स्टेशनों के डेटा पर आधारित मॉडल अगर बार-बार चूक रहा है, तो यह डेटा संग्रहण और विश्लेषण की गुणवत्ता पर भी सवाल खड़े करता है।
समाधान स्पष्ट है। पहले स्रोतों की सटीक पहचान, फिर डेटा की गुणवत्ता में सुधार और उसके बाद ही मॉडल का विस्तार। साथ ही, पारदर्शिता और जवाबदेही तय करना भी जरूरी है। वायु प्रदूषण से लड़ाई केवल मशीनों और मॉडलों से नहीं जीती जा सकती, बल्कि ठोस नीति, सटीक विज्ञान और गंभीर अमल से ही संभव है।
आशीष जोशी: ashish.joshi@in.patrika.com
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Updated on:
22 Apr 2026, 2:57 PM IST
Published on:
22 Apr 2026, 2:57 PM IST
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