
उमा व्यास
कृषि केवल अन्न उत्पादन की प्रक्रिया नहीं है; यह किसी भी समाज की जीवनरेखा है। इस जीवनरेखा को जीवित रखने में जिन हाथों का योगदान सबसे अधिक है, वे अक्सर इतिहास और नीतियों में सबसे कम दिखाई देते हैं, और वे हाथ महिलाओं के हैं। खेतों में उनका श्रम व्यापक है, लेकिन पहचान सीमित। इसी अदृश्य श्रम और असमानता को वैश्विक स्तर पर रेखांकित करने के उद्देश्य से वर्ष 2026 को महिला किसानों पर केंद्रित अंतरराष्ट्रीय वर्ष के रूप में मनाने की पहल की जा रही है, जिसका समन्वय खाद्य एवं कृषि संगठन द्वारा किया जा रहा है। ऐसे प्रयासों का उद्देश्य महत्वपूर्ण सामाजिक विषयों पर वैश्विक ध्यान आकर्षित करना और नीतिगत सुधार को प्रोत्साहित करना है। यह पहल स्मरण कराती है कि खाद्य उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनने के बावजूद महिलाओं को भूमि, संसाधनों और अवसरों में समान अधिकार अब भी पर्याप्त रूप से प्राप्त नहीं हुए हैं।
भारत जैसे कृषि प्रधान देश में ग्रामीण महिलाओं का जीवन खेतों से गहराई से जुड़ा हुआ है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा जारी पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे 2023 24 के अनुसार ग्रामीण महिलाओं का एक बड़ा हिस्सा कृषि और उससे जुड़े कार्यों में संलग्न है। बीज बोने से लेकर रोपाई, निराई गुड़ाई, कटाई और पशुपालन तक खेती के लगभग हर चरण में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
वैश्विक स्तर पर भी महिलाओं की भूमिका कृषि और खाद्य प्रणालियों में अत्यंत महत्वपूर्ण है। खाद्य एवं कृषि संगठन की रिपोर्टों के अनुसार विश्व की कृषि और खाद्य प्रणालियों के कार्यबल का लगभग 36 से 40 प्रतिशत हिस्सा महिलाएँ हैं। ग्रामीण क्षेत्रों से पुरुषों के शहरों की ओर पलायन बढ़ने के कारण कृषि का एक नया सामाजिक स्वरूप सामने आया है, जिसे विशेषज्ञ कृषि का स्त्रीकरण कहते हैं। अर्थात खेती की जिम्मेदारी धीरे धीरे महिलाओं के कंधों पर अधिक आती जा रही है।
हालाँकि इस वास्तविकता के साथ एक विरोधाभास भी जुड़ा हुआ है। जहाँ महिलाएँ खेती के श्रम और प्रबंधन का बड़ा हिस्सा संभालती हैं, वहीं भूमि पर उनका स्वामित्व सीमित है। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार भारत में महिलाओं के नाम पर कृषि भूमि का स्वामित्व लगभग 12 से 14 प्रतिशत के बीच है। भूमि उनके नाम न होने के कारण उन्हें बैंक ऋण, कृषि बीमा, सब्सिडी और तकनीकी प्रशिक्षण जैसी सुविधाओं तक पहुँच प्राप्त करने में कठिनाई होती है। इस प्रकार वे खेती की मेहनतकश शक्ति तो हैं, किंतु किसान के रूप में उनकी पहचान अक्सर अधूरी रह जाती है।
महिला किसान का श्रम केवल खेत तक सीमित नहीं रहता। उन्हें कृषि कार्यों के साथ घरेलू जिम्मेदारियाँ, पशुपालन तथा जल और ईंधन की व्यवस्था भी संभालनी पड़ती है। कई अध्ययनों में यह भी पाया गया है कि ग्रामीण महिलाओं का दैनिक कार्य समय पुरुषों से अधिक होता है, फिर भी उन्हें समान कार्य के लिए कम मजदूरी मिलती है।
हाल के वर्षों में कुछ सकारात्मक परिवर्तन भी दिखाई देने लगे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से महिलाएँ आर्थिक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी बढ़ा रही हैं। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन और महिला किसान सशक्तिकरण परियोजना जैसी पहलें महिलाओं को प्रशिक्षण, वित्तीय संसाधन और बाजार से जोड़ने का प्रयास कर रही हैं। कई स्थानों पर महिलाएँ प्राकृतिक और जैविक खेती जैसी टिकाऊ कृषि प्रणालियों को अपनाने में अग्रणी भूमिका निभा रही हैं।
सरकार की नई पहलें महिलाओं को कृषि में आधुनिक तकनीक से भी जोड़ रही हैं। नमो ड्रोन दीदी योजना के माध्यम से स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं को कृषि ड्रोन उपलब्ध कराए जा रहे हैं, जिनसे फसलों पर उर्वरक और कीटनाशकों का छिड़काव किया जा सकता है। इसी प्रकार सोलर दीदी कार्यक्रम के अंतर्गत महिलाओं को सौर ऊर्जा आधारित उपकरणों के उपयोग का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
निस्संदेह भारतीय कृषि का भविष्य महिलाओं के बिना कल्पना नहीं किया जा सकता। वे केवल खेत की श्रमिक नहीं बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पारिवारिक पोषण और खाद्य सुरक्षा की आधारशिला हैं। यदि कृषि को वास्तव में समावेशी और टिकाऊ बनाना है, तो महिला किसानों को श्रम की अदृश्य शक्ति नहीं बल्कि अधिकार और निर्णय की समान भागीदार के रूप में स्वीकार करना होगा। तभी कृषि का यह बढ़ता स्त्रीकरण सामाजिक न्याय और आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में सार्थक परिवर्तन ला सकेगा।
Updated on:
21 Apr 2026, 5:33 PM IST
Published on:
21 Apr 2026, 5:32 PM IST
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