
supreme court
अपने तरह के अनूठे फैसले में मद्रास हाईकोर्ट ने एक मामले के सुप्रीम कोर्ट में छह साल से ज्यादा लंबित रहने पर चिंता जताकर आत्मनिरीक्षण की दिशा में महत्त्वपूर्ण पहल करते हुए अदालतों को अपनी जिम्मेदारियों की याद भी दिलाई हैं। हाईकोर्ट ने कहा कि यह मामला 'न्याय का घोर उपहास बन गया है।' यह टिप्पणी 2016 में तमिलनाडु के राधापुरम विधानसभा सीट पर हुए चुनाव विवाद के संदर्भ में सामने आई है जिसमें द्रमुक नेता एम अप्पावु महज 49 वोटों से हार गए थे। उन्होंने डाक मतपत्रों की गिनती में गड़बड़ी का आरोप लगाया था। 2019 में मद्रास हाईकोर्ट ने दोबारा गिनती का आदेश दिया, जिसके खिलाफ अन्नाद्रमुक के उम्मीदवार आइ एस इनबदुरई सुप्रीम कोर्ट चले गए। शीर्ष अदालत ने वोटों की दोबारा गिनती की अनुमति तो दी, लेकिन नतीजों की घोषणा पर रोक लगा दी। विडंबना यह कि सुप्रीम कोर्ट से मई 2026 में इसका अंतिम निपटारा तब हुआ जब वहां दो बार चुनाव हो चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी यही कहा कि अब सुनवाई को कोई औचित्य नहीं रह गया है।
राधापुरम प्रकरण अधिक चिंताजनक इसलिए है क्योंकि 'जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951' की धारा 86 (7) स्पष्ट रूप से कहती है कि चुनावी याचिकाओं का निपटारा छह महीने के भीतर किया जाना चाहिए। जब संसद ने समय-सीमा तय की है, तो सालों-साल इन मामलों का ठंडे बस्ते में रहना कानून की भावना के खिलाफ है। मद्रास हाईकोर्ट के जस्टिस जी जयचंद्रन की प्रतिबद्धता सराहनीय है जिन्होंने स्पष्ट किया कि अदालत महज 'समय बीत जाने' का बहाना बनाकर अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकती। उन्होंने न्याय में देरी को एक गंभीर चेतावनी मानते हुए कहा, 'चुनाव याचिकाओं पर यदि अदालतें समय से फैसला नहीं करेंगी, तो भारत निरंकुश देश में बदल सकता है।' इससे संविधान प्रदत्त लोकतंत्र और वयस्क मताधिकार की सच्ची भावना कमजोर होगी। दरअसल, यह मामला इस बात का जीवंत उदाहरण है कि कैसे 'न्याय में देरी, न्याय की हत्या' बन जाती है।
पुनर्मतगणना के नतीजे व्यवस्था को आईना दिखाने वाले हैं। जिन 203 डाक मतपत्रों को अवैध घोषित किया गया था, उनमें से 153 वोट अप्पावु के पक्ष में थे और प्रतिद्वंदी को सिर्फ एक वोट मिला था। इस तरह अप्पावु 103 वोटों से चुनाव जीत चुके थे। यानी मतदाताओं ने जिसे अपना प्रतिनिधि चुना ही नहीं था, वह पूरे पांच साल तक विधानसभा में बैठता रहा और सरकारी संसाधनों का उपभोग करता रहा। दूसरी ओर, जनता का वास्तविक प्रतिनिधि न्याय की आस में अदालतों के चक्कर काटता रहा। भले ही अंतिम फैसले के बाद कागजों में अब अप्पावु का नाम दर्ज कर दिया गया हो, लेकिन क्या यह तंत्र उस क्षेत्र की जनता को उनके पांच साल वापस लौटा सकता है? यह प्रकरण लोकतंत्र के एक प्रहसन में तब्दील होने की चेतावनी से कम नहीं है।
Published on:
06 Jun 2026 03:22 pm
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