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गर्भावस्था के दौरान देखभाल में कमी से बढ़ता जोखिम

कुछ आयुर्वेदिक दवाओं में लेड, मर्करी या आर्सेनिक जैसी धातुओं की मौजूदगी भी पाई गई है।ये कारक पहले से मौजूद हाई-रिस्क गर्भावस्था के साथ जुड़ जाएं तो मां और शिशु, दोनों के लिए गंभीर जटिलताओं का खतरा बढ़ सकता है।
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जयपुर

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Opinion Desk

Jul 25, 2026

pregnancy

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डॉ. श्रीगोपाल काबरा, (वरिष्ठ चिकित्सक)

हाल के महीनों में राजस्थान के छोटे और दूर-दराज के अस्पतालों में इमरजेंसी सिजेरियन डिलीवरी के बाद प्रसूताओं की मौत के मामलों में चिंताजनक बढ़ोतरी देखी गई। ये दुखद घटनाएं सिर्फ आंकड़े नहीं, बल्कि उन युवा प्रसूताओं की कहानी हैं, जिन्होंने नई जिंदगी को जन्म देते हुए अपनी जान गंवा दी। उनकी मौतें गर्भावस्था के दौरान देखभाल में गंभीर कमियों की ओर इशारा करती हैं। जिन महिलाओं की मौतें हुईं, उनमें अधिकांश पहले से ही हाई-रिस्क गर्भावस्था से जूझ रही थीं।

इनमें गर्भावस्था में टॉक्सेमिया (खतरनाक रूप से हाई ब्लड प्रेशर), एचईएलएलपी सिंड्रोम (लिवर और रक्त के थक्के बनने से जुड़ी गंभीर समस्या) तथा गंभीर एनीमिया जैसी स्थितियां शामिल थीं। हालांकि मौत का तात्कालिक कारण सिजेरियन ऑपरेशन के दौरान उत्पन्न जटिलताएं थीं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि मूल समस्या गर्भावस्था के दौरान पर्याप्त और समय पर देखभाल का अभाव था। गर्भावस्था के दौरान आयुर्वेदिक दवाओं के बढ़ते उपयोग ने भी विशेषज्ञों का ध्यान खींचा है। ये दवाएं अक्सर बिना चिकित्सकीय सलाह के ली जाती हैं और आशा वर्कर, एएनएम या पारंपरिक दाइयों द्वारा इनका रेकॉर्ड भी नहीं रखा जाता।

परिवार इन्हें प्राकृतिक और सुरक्षित मानते हैं, जबकि इनमें कुछ छिपे हुए जोखिम हो सकते हैंं। विशेषज्ञों के अनुसार, कुछ जड़ी-बूटियां गर्भाशय को उत्तेजित कर समय से पहले संकुचन पैदा कर सकती हैं, हर्बल मिश्रण हार्मोनल संतुलन में बाधा डालते हैं जो स्वस्थ गर्भावस्था के लिए जरूरी हैं। कुछ आयुर्वेदिक दवाओं में लेड, मर्करी या आर्सेनिक जैसी धातुओं की मौजूदगी भी पाई गई है। ये कारक पहले से मौजूद हाई-रिस्क गर्भावस्था के साथ जुड़ जाएं तो मां और शिशु, दोनों के लिए गंभीर जटिलताओं का खतरा बढ़ सकता है। गर्भावस्था के दौरान पारंपरिक उपचारों का रेकॉर्ड नहीं रखने से डॉक्टर्स के लिए जटिलताओं का कारण समझना मुश्किल हो जाता है। इमरजेंसी में यह जानलेवा साबित हो सकता है।

इसी कारण विशेषज्ञ मातृ मृत्यु में आयुर्वेदिक उपचारों की भूमिका की व्यवस्थित जांच की आवश्यकता बता रहे हैं। उनके अनुसार, क्लिनिकल ऑडिट, आयुर्वेदिक दवाओं की टॉक्सिकोलॉजिकल जांच और सामुदायिक सर्वे के माध्यम से इन उपचारों के वास्तविक प्रभाव का बेहतर आकलन किया जा सकता है। मकसद आयुर्वेद को खारिज करना नहीं है, जिसकी सांस्कृतिक जड़ें गहरी हैं, बल्कि सुरक्षा सुनिश्चित करना है। हेल्थ वर्करों को यह पूछना और रिकॉर्ड करना चाहिए कि गर्भवती महिलाएं कौन-से इलाज अपना रही हैं। परिवारों को गर्भावस्था के दौरान बिना जांचे-परखे हर्बल दवाओं के खतरों के बारे में जानकारी दी जानी चाहिए। डॉक्टरों को गर्भावस्था की जटिलताओं का इलाज करते समय हर्बल दवाओं से होने वाले जहरीले असर (टॉक्सिसिटी) पर विचार करने के लिए प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। इसके अलावा सरकार गर्भवती महिलाओं के लिए बेची जाने वाली आयुर्वेदिक दवाओं को रेगुलेट कर सकती है और उनकी गुणवत्ता तथा सुरक्षा की नियमित जांच सुनिश्चित कर सकती है।