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प्रदेश में ‘गो-सेवा’ केवल भावनात्मक मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक आस्था का केंद्र भी है। यही कारण है कि जब सरकार ‘गो-सेस’ के नाम पर जनता से हजारों करोड़ रुपये वसूलती है, तो उम्मीद यह रहती है कि यह राशि सीधे गौवंश के संरक्षण, पोषण और उपचार में लगेगी। लेकिन हाल ही में सामने आए आंकड़ों इस भरोसे पर गहरी चोट करते नजर आ रहे हैं।
करीब 7124 करोड़ रुपए की वसूली और उसमें से 2864 करोड़ रुपये का खजाने में यों ही पड़े रहना, सिर्फ वित्तीय लापरवाही नहीं, बल्कि नीति और नीयत दोनों पर सवाल खड़े करता है। यह वह दौर है जब प्रदेश की हजारों गौशालाएं चारे के लिए जूझ रही हैं, संचालक कर्ज में डूब रहे हैं और सड़कों पर बेसहारा गौवंश दुर्घटनाओं का कारण बन रहा है। सवाल सीधा है-जब पैसा है, तो समस्या क्यों है?
विडंबना यह है कि यह पैसा शराब और स्टाम्प ड्यूटी जैसे स्रोतों से आया है। यानी एक ओर सरकार राजस्व बढ़ाने के लिए इन माध्यमों का सहारा लेती है और दूसरी ओर उसी राजस्व का एक हिस्सा ‘गो-सेवा’ के नाम पर अलग रखकर भी उसका समुचित उपयोग नहीं कर पाती। यह दोहरी नीति न केवल प्रशासनिक अक्षमता को उजागर करती है, बल्कि आस्था के साथ भी अन्याय है।
गौशाला संचालकों की पीड़ा और भी गंभीर है। गेहूं की कटाई के इस समय ‘खाखला’ (तूड़ी) सस्ती दरों पर उपलब्ध है। यानी यह चारा भंडारण का सबसे उपयुक्त समय है। यदि समय पर अनुदान मिल जाए, तो सालभर की व्यवस्था सहज हो सकती है। लेकिन सरकारी फाइलों की धीमी रफ्तार इस अवसर को संकट में बदल देती है। यही कारण है कि गौशालाएं महंगे कर्ज लेने को मजबूर होती हैं और अंततः इसका सीधा असर गौवंश पर पड़ता है।
सरकार की ओर से यह तर्क दिया जा रहा है कि अनुदान प्रक्रियाधीन है और चरणबद्ध तरीके से जारी किया जा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि जब खजाने में हजारों करोड़ रुपए पहले से उपलब्ध हैं, तो यह ‘प्रक्रिया’ इतनी लंबी क्यों है? क्या यह प्रशासनिक जटिलता है या प्राथमिकता का अभाव? सबसे बड़ी कमी पारदर्शिता और जवाबदेही की है। ‘गो-सेस’ के नाम पर वसूले गए एक-एक पैसे का स्पष्ट और सार्वजनिक लेखा-जोखा होना चाहिए। किस जिले को कितना अनुदान मिला, किस गौशाला को कितना और कब आवंटित हुआ…यह जानकारी न केवल उपलब्ध हो, बल्कि नियमित रूप से अपडेट होने के साथ इसकी ऑडिट भी होनी चाहिए।
एक स्वतंत्र मॉनिटरिंग तंत्र की आवश्यकता है, जो यह सुनिश्चित करे कि राशि का उपयोग वास्तविक जरूरतों पर ही हो। चारे, चिकित्सा, आश्रय और सुरक्षा पर। केवल घोषणाएं और आंकड़े पर्याप्त नहीं हैं, जमीन पर बदलाव भी दिखना चाहिए।‘गो-सेवा’ केवल नारे और सेस तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यह सरकार की संवेदनशीलता और प्रशासनिक दक्षता की परीक्षा है। यदि हजारों करोड़ रुपए होने के बावजूद गायें भूखी हैं, तो यह केवल व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि समाज के विश्वास के साथ भी एक तरह से धोखा है। अब समय है कि सरकार इस ‘सेस’ को ‘सेवा’ में बदले, वरना यह मुद्दा केवल सड़कों पर भटकते गौवंश का नहीं, बल्कि शासन की विश्वसनीयता का बन जाएगा।
आशीष जोशी: ashish.joshi@in.patrika.com
Updated on:
28 Mar 2026 03:40 pm
Published on:
28 Mar 2026 03:39 pm
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