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पत्रिका में प्रकाशित आलेख: किसे शर्म आएगी ?

पचपदरा रिफाइनरी के लोकार्पण से ठीक पहले हुए अग्निकांड ने एक बार फिर अति महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों की सुरक्षा प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सुरक्षा संबंधी चूकों के चलते हम पहले भी अपने दो प्रधानमंत्रियों को खो चुके हैं।

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जयपुर

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Bhuwanesh Jain

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भुवनेश जैन

Apr 22, 2026

WEB PRAWAH UPDATE

फोटो: पत्रिका

पचपदरा रिफाइनरी के लोकार्पण से ठीक पहले हुए अग्निकांड ने एक बार फिर अति महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों की सुरक्षा प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सुरक्षा संबंधी चूकों के चलते हम पहले भी अपने दो प्रधानमंत्रियों को खो चुके हैं। उस समय भी ऐसे ही सवाल खड़े हुए थे। लेकिन लगता है हमने आज तक कोई सबक नहीं सीखा है। क्या यह सुरक्षा प्रणाली की ही चूक है या उन शीर्ष अधिकारियों की मानसिकता भी सवालों के घेरे में है, जिन पर अति महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी है?

महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों की सुरक्षा में हुई चूक की घटनाओं से यह सबक मिलता है कि ऐसे व्यक्तियों के आगमन के समय सुरक्षा कड़ी करने से भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण है, मौके का पूर्व-आकलन तथा केन्द्र और राज्य की विभिन्न एजेंसियों के बीच गहरा तालमेल। प्रायः महत्त्वपूर्ण व्यक्ति के आगमन के बाद तो पूरी मुस्तैदी बरती जाती है, लेकिन पूर्व-आकलन और तालमेल के मामले में उतनी गंभीरता नहीं बरती जाती। रिफाइनरी की घटना भी कुछ ऐसे ही संकेत देती है। क्या रिफाइनरी का निर्माण करने वाली एजेंसी, उसके इंजीनियरों और सुरक्षा एजेंसियों के बीच विस्तृत चर्चा हुई? लोकार्पण कार्यक्रम से पहले क्या सभी तकनीकी प्रणालियों का सुरक्षा की दृष्टि से परीक्षण हुआ?

देखा गया है कि हमारे यहां पूर्व-आकलन में गंभीर लापरवाहियां बरती जाती है। बाद में जब घटना हो जाती है तो जांच का उपक्रम किया जाता है। सांप गुजर जाने के बाद लकीर पर लाठी पीटने से क्या फायदा? पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की हत्या के बाद अति महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों की सुरक्षा के लिए नए सिरे से काम किया गया। एसपीजी, जेड प्लस, जेड वाई प्लस, वाई और एक्स श्रेणी के सुरक्षा घेरे बनाए गए, पर कालांतर में विभिन्न श्रेणी की सुरक्षा हासिल करना प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया। पूर्व-आकलन और समय पर जितना ध्यान देना चाहिए था उतना नहीं दिया गया। सबसे बड़ी बात कि चूक की घटना के बाद जिम्मेदारों पर कठोर कार्रवाई नहीं होती।

इसका नतीजा यह हुआ कि सुरक्षा के लिए जिम्मेदार शीर्ष अफसरों में उत्तरदायित्व का बोध ही दिखाई नहीं देता। ना घटना होने पर उन्हें किसी तरह की शर्म आती। भले ही पूरी दुनिया के सामने देश का सिर शर्म से झुक जाए। होना यह चाहिए कि किसी भी तरह की जांच शुरू होने से पूर्व महत्त्वपूर्ण व्यक्ति की संबंधित यात्रा के लिए जिम्मेदार सभी लोगों को तुरंत प्रभाव से पदमुक्त कर दिया जाए और फिर किसी तरह की जांच की जाए। इतनी कठोरता होगी तभी लापरवाही की घटनाएं बंद होंगी। बयालीस वर्ष पूर्व तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके ही अंगरक्षकों ने प्रधानमंत्री के सरकारी निवास पर हत्या कर दी थी। कितनी बड़ी चूक रही होगी ! इसके सात साल बाद 21 मई 1991 को उनके पुत्र पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को तमिलनाडु के श्रीपेरम्बदूर में एक आत्मघाती हमलावर ने बम विस्फोट से उड़ा दिया। पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री सरदार बेअंत सिंह की सचिवालय परिसर में हत्या कर दी गई।

ये तो बड़ी-बड़ी घटनाएं हैं। सुरक्षा में छोटी, लेकिन महत्त्वपूर्ण चूकों के तो बीसियों उदाहरण हैं। गत वर्ष राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा का चार्टर प्लेन फलोदी के कुंडल एयरबेस की जगह फलोदी हवाई पट्टी पर उतार दिया गया। उनके काफिले में तेज रफ्तार टैक्सी घुसने की भी घटना हुई। वर्ष 2015 में प्रधानमंत्री मोदी की पटना रैली के दौरान एक संदिग्ध व्यक्ति मंच के पास तक पहुंच गया था। पंजाब यात्रा के दौरान तो उनका काफिला प्रदर्शनकारी किसानों के कारण फ्लाई ओवर पर 20 मिनट से ज्यादा समय तक फंसा रहा था। ये सभी घटनाएं पूर्व आकलन की कमी और राज्य व केन्द्र की विभिन्न एजेंसियों में तालमेल के अभाव को प्रदर्शित करती हैं। क्या हर बड़े आयोजन से पहले संभावित खतरों का गहराई से आकलन नहीं होना चाहिए।

किसी भी अति महत्त्वपूर्ण व्यक्ति के कार्यक्रम में सुरक्षा चूक को केवल तकनीकी गलती कह कर बचा नहीं जा सकता। इससे कहीं अधिक यह प्रशासनिक लापरवाही का संकेत है। सुरक्षा एजेंसियों के शीर्ष पर बैठे अधिकारी ही नीति बनाते हैं, बजट तय करते है, संभावित खतरों के पूर्व-आकलन की रणनीतियां बनाते हैं, अन्य एजेंसियों व स्थानीय प्रशासन से तालमेल का तरीका तय करते हैं। सुरक्षा व्यवस्था में नई-नई तकनीक के समावेश पर निर्णय करने के लिए भी ये ही जिम्मेदार है। सुरक्षा की सुव्यवस्था का श्रेय ये अफसर लेते हैं तो लापरवाही की जिम्मेदारी भी लेनी होगी। जांच के नाम पर जिम्मेदारी को इधर-उधर टालने और लीपा-पोती करने की प्रवृत्ति कम से कम राष्ट्रीय सुरक्षा और अति महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों और स्थानों की सुरक्षा के मामले में किसी भी हाल में स्वीकार्य नहीं होनी चाहिए।

bhuwan.jain@in.patrika.com