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कॉर्पोरेट गवर्नेंस: बैंक की स्थिरता और सफलता का आधार

यदि ग्राहकों को किसी भी स्तर पर यह लगे कि किसी बैंक के प्रबंधन में पारदर्शिता की कमी है या वहां निर्णय पक्षपातपूर्ण हो सकते हैं, तो वे अपनी पूंजी को वहां सुरक्षित रखने में संकोच कर सकते हैं।

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जयपुर

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Opinion Desk

Jun 06, 2026

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डॉ. मिलिंद कुमार शर्मा, (प्रोफेसर, एम.बी.एम. विश्वविद्यालय, जोधपुर)

प्रारंभ से ही भारत के बैंकिंग क्षेत्र में निगम संचालन 'कॉर्पोरेट गवर्नेंस' की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण मानी जाती रही है, क्योंकि यह न केवल संस्थान की पारदर्शिता और जवाबदेही को सुनिश्चित करती है, अपितु निवेशकों, ग्राहकों और नियामक संस्थाओं के विश्वास को भी सुदृढ़ करती है। कॉर्पोरेट गवर्नेंस का मूल उद्देश्य किसी भी संगठन में निर्णय लेने की प्रक्रिया को पारदर्शी, निष्पक्ष और उत्तरदायी बनाना होता है। बैंकिंग क्षेत्र में इसका महत्त्व और भी बढ़ जाता है।

प्राय: बैंकों को सुदृढ़ प्रबंधन और उच्च मानकों के लिए जाना जाता रहा है। ऐसे में यदि वहां कॉर्पोरेट गवर्नेंस से संबंधित कोई प्रश्न उठता है, तो पूरे वित्तीय तंत्र के लिए चिंता का विषय बन जाना स्वाभाविक है। कॉर्पोरेट गवर्नेंस के तहत यह अपेक्षा की जाती है कि बोर्ड के सदस्य अपने व्यक्तिगत हितों को संगठन के हितों से ऊपर न रखें। यदि किसी निर्णय में उनका निजी लाभ जुड़ा हो, तो उन्हें उस प्रक्रिया से स्वयं को पृथक कर लेना चाहिए। ऐसा न करने पर न केवल निर्णय की निष्पक्षता पर सवाल उठता है, अपितु संस्था की साख पर भी प्रभाव पड़ता है।

निश्चित रूप से यह स्पष्ट है कि प्रबंधन मंडल स्तर पर भी यदि सतर्कता में कमी आती है, तो उसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। नियामक संस्थाओं, विशेष रूप से भारतीय रिजर्व बैंक और भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड द्वारा समय-समय पर बैंकों को कॉर्पोरेट गवर्नेंस के उच्च मानकों का पालन करने के निर्देश दिए जाते हैं। इसके बाद भी यदि किसी संस्थान में इस प्रकार की स्थिति उत्पन्न होती है, तो यह इस बात का द्योतक है कि आंतरिक नियंत्रण और निगरानी तंत्र को और अधिक सुदृढ़ करने की आवश्यकता है। बैंकिंग प्रणाली पूरी तरह विश्वास पर आधारित होती है। यदि ग्राहकों को किसी भी स्तर पर यह लगे कि किसी बैंक के प्रबंधन में पारदर्शिता की कमी है या वहां निर्णय पक्षपातपूर्ण हो सकते हैं, तो वे अपनी पूंजी को वहां सुरक्षित रखने में संकोच कर सकते हैं। इसलिए कॉर्पोरेट गवर्नेंस केवल एक औपचारिकता मात्र नहीं, अपितु बैंक की दीर्घकालिक स्थिरता और सफलता का महत्त्वपूर्ण आधार स्तंभ है।

यदि प्रबंधन मंडल के सदस्य स्वयं इन मानकों का पालन करने में विफल रहते हैं तो पूरी प्रणाली के कमजोर होने की संभावना प्रबल हो जाती है। अत: प्रबंधन मंडल में निष्पक्ष दृष्टिकोण से निर्णय लेने में सहायता करने वाले स्वतंत्र निवेशकों की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो जाती है। यदि समय रहते ऐसे मुद्दों की पहचान कर ली जाए, तो निश्चित रूप से बड़े संकट से बचा जा सकता है। इसके लिए नियमित ऑडिट, पारदर्शी रिपोर्टिंग और कर्मचारियों के लिए व्हिसलब्लोअर तंत्र का सुदृढ़ होना आवश्यक है।

आज के वैश्विक वातावरण में कंपनियों को वित्तीय प्रदर्शन पर ध्यान देने के साथ ही नैतिकता और पारदर्शिता को भी समान महत्त्व देना होगा। जो कंपनियां इन मूल्यों को अपनाती हैं, वे दीर्घकाल में अधिक सफल और स्थिर होती हैं। कॉर्पोरेट गवर्नेंस सतत प्रक्रिया है, जिसमें निरंतर सुधार और सतर्कता की आवश्यकता होती है। इस संदर्भ में यह होना चाहिए कि बैंक और अन्य वित्तीय संस्थाएं अपने गवर्नेंस ढांचे को और अधिक सुदृढ़ करें, पारदर्शिता को बढ़ावा दें और सभी हितधारकों के हितों की रक्षा सुनिश्चित करें। नियामक संस्थाओं को भी निगरानी को और अधिक नियमित और प्रभावी बनाना होगा।