
EnergyStorage
गोपेश शर्मा,चार्टर्ड इंजीनियर एवं लेखक
सूर्य से बिजली बनाना अब उपलब्धि नहीं, उसे सूर्यास्त के बाद भी उपलब्ध कराना नई ऊर्जा क्रांति है। भारत की ऊर्जा यात्रा आज ठीक इसी ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ी है। पिछले एक दशक में देश ने सौर ऊर्जा उत्पादन में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है, लेकिन अब ऊर्जा क्षेत्र का सबसे बड़ा परिवर्तन उत्पादन से आगे बढक़र ऊर्जा भंडारण की दिशा में दिखाई दे रहा है। यही परिवर्तन भारत को ऊर्जा आत्मनिर्भरता के एक नए युग में ले जाने की क्षमता रखता है। कुछ वर्ष पहले तक विद्युत अभियांत्रिकी का एक स्थापित सिद्धांत था कि बड़े पैमाने पर बिजली का आर्थिक और व्यावहारिक भंडारण संभव नहीं है। इसलिए जितनी बिजली उत्पन्न होती थी, उसका लगभग उसी समय उपयोग करना आवश्यक होता था। उत्पादन और खपत के बीच संतुलन बनाए रखना ही विद्युत तंत्र की सबसे बड़ी चुनौती माना जाता था। यही कारण था कि नवीकरणीय ऊर्जा, विशेषकर सौर ऊर्जा, की सबसे बड़ी सीमा उसकी अनियमित उपलब्धता थी। लेकिन आज बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (बीइएसएस) पंप स्टोरेज और ग्रीन हाइड्रोजन जैसी तकनीकों ने इस दशकों पुरानी अवधारणा को बदलना शुरू कर दिया है। ऊर्जा का भविष्य अब केवल उत्पादन में नहीं, बल्कि उसके सुरक्षित, स्मार्ट और दीर्घकालिक भंडारण में भी निहित है। भारत ने इस दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की है। देश की स्थापित गैर-जीवाश्म विद्युत क्षमता 240 गीगावाट से अधिक हो चुकी है, जिसमें लगभग 110 गीगावाट सौर और 55 गीगावाट पवन ऊर्जा का योगदान है। वर्ष 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म विद्युत क्षमता का लक्ष्य इस बात का प्रमाण है कि भारत अब केवल स्वच्छ ऊर्जा का उत्पादक नहीं, बल्कि विश्वसनीय हरित ऊर्जा व्यवस्था विकसित करने की दिशा में भी अग्रसर है।
राजस्थान देश की सौर ऊर्जा राजधानी
सौर ऊर्जा की सबसे बड़ी चुनौती हमेशा यह रही कि सूर्य दिन में ऊर्जा देता है, जबकि बिजली की सर्वाधिक मांग प्राय: शाम और रात्रि के पीक आवर्स में होती है। अब तक इस अंतर को कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्र पूरा करते रहे हैं। लेकिन अब बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (बीइएसएस) इस चुनौती का प्रभावी समाधान बनकर उभरा है। दिन में सौर संयंत्रों से उत्पादित अतिरिक्त बिजली को बैटरियों में सुरक्षित रखकर आवश्यकता के समय उपयोग किया जा सकता है। इससे कोयला आधारित उत्पादन पर निर्भरता घटेगी, कार्बन उत्सर्जन कम होगा, ग्रिड अधिक स्थिर बनेगा और उपभोक्ताओं को अधिक विश्वसनीय बिजली उपलब्ध होगी। स्पष्ट है कि ऊर्जा क्षेत्र का अगला चरण ‘अधिक उत्पादन’ नहीं, बल्कि ‘स्मार्ट भंडारण’ है। इस परिवर्तन की झलक अब राज्यों की परियोजनाओं में भी स्पष्ट दिखाई देने लगी है। राजस्थान, जो पहले ही देश की सौर ऊर्जा राजधानी के रूप में स्थापित हो चुका है, अब ऊर्जा भंडारण के क्षेत्र में भी नई पहचान बना रहा है। हाल ही में राजस्थान विद्युत विनियामक आयोग (आरइआरसी) द्वारा बीकानेर के पूगल सोलर पार्क में 2450 मेगावाट सौर परियोजना के साथ 1600 मेगावाट/6400 मेगावाट-घंटा क्षमता वाले बैटरी ऊर्जा भंडारण तंत्र (बीइएसएस)को स्वीकृति देना इसी दिशा में ऐतिहासिक पहल है। इस परियोजना की सबसे बड़ी विशेषता यह होगी कि दिन में उत्पादित अतिरिक्त सौर ऊर्जा को बैटरियों में संचित कर शाम और रात्रि के पीक आवर्स में उपभोक्ताओं तक पहुंचाया जाएगा। यह केवल राजस्थान की उपलब्धि नहीं, बल्कि इस बात का संकेत है कि भारत की हरित ऊर्जा नीति अब उत्पादन के साथ-साथ ऊर्जा भंडारण आधारित बिजली व्यवस्था की ओर निर्णायक रूप से बढ़ रही है।
सूर्य, जल और हरित तकनीक का समन्वय
यदि बैटरी ऊर्जा को कुछ घंटों के लिए सुरक्षित रखती है, तो ग्रीन हाइड्रोजन उसे लंबे समय तक संरक्षित रखने का माध्यम बन सकता है। यही कारण है कि इसे भविष्य का हरित ईंधन कहा जा रहा है। ग्रीन हाइड्रोजन का निर्माण पानी के विद्युत अपघटन द्वारा किया जाता है, जिसमें ऊर्जा का स्रोत सौर और पवन जैसी नवीकरणीय बिजली होती है। इस प्रक्रिया में कार्बन उत्सर्जन लगभग शून्य रहता है और ऑक्सीजन उपयोगी उप-उत्पाद के रूप में प्राप्त होती है।
इस तकनीक ने जल की उपयोगिता को भी नया आयाम दिया है। जिस जल को अब तक हम मुख्यत: पेयजल, सिंचाई और जलविद्युत के संदर्भ में देखते रहे, वही भविष्य में स्वच्छ ऊर्जा का स्रोत भी बन सकता है। अर्थात सूर्य, जल और हरित तकनीक का यह समन्वय ऊर्जा क्षेत्र में एक नई क्रांति का आधार बन रहा है। भारत ने राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन के तहत वर्ष 2030 तक प्रतिवर्ष लगभग 50 लाख टन ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन का लक्ष्य रखा है। इस्पात, उर्वरक, रिफाइनरी, जहाजरानी और भारी परिवहन जैसे क्षेत्रों में इसका उपयोग जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। ऊर्जा भंडारण का एक और महत्त्वपूर्ण माध्यम पंप स्टोरेज परियोजनाएं हैं। अतिरिक्त बिजली उपलब्ध होने पर पानी को ऊंचे जलाशयों तक पंप किया जाता है और आवश्यकता पडऩे पर वही पानी टर्बाइन चलाकर पुन: बिजली उत्पन्न करता है। बैटरी स्टोरेज और पंप स्टोरेज का संयुक्त उपयोग भविष्य की ऐसी ऊर्जा व्यवस्था तैयार करेगा, जिसमें नवीकरणीय ऊर्जा की अनिश्चितता काफी हद तक समाप्त हो जाएगी।
चुनौतियां भी कम नहीं
हरित ऊर्जा का यह परिवर्तन केवल पर्यावरण संरक्षण का विषय नहीं, बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। भारत आज भी कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस और कोयले के आयात पर बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा खर्च करता है। यदि देश अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा सूर्य, हवा और जल से प्राप्त कर उसका प्रभावी भंडारण करने में सफल होता है, तो आयातित ईंधनों पर निर्भरता घटेगी, ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी और विदेशी मुद्रा की उल्लेखनीय बचत होगी। यही नहीं, वैश्विक ऊर्जा संकटों का प्रभाव भी भारतीय अर्थव्यवस्था पर अपेक्षाकृत कम पड़ेगा।
इस परिवर्तन का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष औद्योगिक विकास और रोजगार भी है। सौर मॉड्यूल, बैटरी निर्माण, इलेक्ट्रोलाइजर, स्मार्ट ग्रिड, ऊर्जा भंडारण प्रणाली और ग्रीन टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में लाखों नए रोजगार सृजित होने की संभावना है। यदि अनुसंधान, नवाचार और घरेलू विनिर्माण को निरंतर प्रोत्साहन मिलता रहा, तो भारत केवल हरित ऊर्जा का उपभोक्ता नहीं, बल्कि इस क्षेत्र में वैश्विक विनिर्माण केंद्र के रूप में भी उभर सकता है।
निश्चित रूप से चुनौतियां भी हैं। बैटरियों के लिए आवश्यक महत्त्वपूर्ण खनिजों की उपलब्धता, प्रयुक्त बैटरियों का पुनर्चक्रण, आधुनिक ट्रांसमिशन नेटवर्क, जल संसाधनों का संतुलित उपयोग तथा पर्याप्त निवेश जैसे विषयों पर समान गंभीरता से कार्य करना होगा। विशेष रूप से ग्रीन हाइड्रोजन के संदर्भ में यह सुनिश्चित करना आवश्यक होगा कि जल का उपयोग स्थानीय परिस्थितियों और पुनर्चक्रित जल के माध्यम से टिकाऊ ढंग से हो, ताकि ऊर्जा सुरक्षा और जल सुरक्षा साथ-साथ आगे बढ़ सकें।
हरित ऊर्जा का भविष्य केवल उत्पादन में नहीं
भारत आज ऊर्जा परिवर्तन के ऐसे चरण में है, जहां सौर ऊर्जा की पहली क्रांति अब ऊर्जा भंडारण की दूसरी क्रांति में परिवर्तित हो रही है। राजस्थान के पूगल सोलर-बैटरी पार्क जैसी परियोजनाएं इस बदलाव की जीवंत मिसाल हैं। वे सिद्ध करती हैं कि भारत की ऊर्जा यात्रा अब केवल दिन में बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं रही, बल्कि दिन की धूप को रात की रोशनी में बदलने की क्षमता विकसित कर रही है। हरित ऊर्जा का वास्तविक भविष्य केवल उत्पादन में नहीं, बल्कि उसके सुरक्षित भंडारण, बुद्धिमत्तापूर्ण प्रबंधन और चौबीसों घंटे उपलब्धता में है। भारत ने इस दिशा में निर्णायक कदम बढ़ा दिए हैं। यदि यही गति बनी रही, तो विकसित भारत की ऊर्जा व्यवस्था केवल सूरज की किरणों से नहीं, बल्कि उन किरणों को संचित करने वाली तकनीकों से संचालित होगी। यही भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता का अगला अध्याय है और यही भविष्य की सबसे उज्ज्वल ऊर्जा क्रांति।
Updated on:
23 Jul 2026 07:00 pm
Published on:
23 Jul 2026 07:00 pm
